मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

फूल को मुरझाते देखा

ये कुछ पंक्तिया उसको समर्पित है जिसने कभी रोना नहीं सिखा पर आज के हालत ने उसे रुलया जो मुझे क्या किसी को भी न भाया।

एक फूल मुरझाया ,मुझे नहीं भाया
देख मेरी  काया भी कंपकपाया
उसके आँखों के आंसू, प्रलय की थी गाथा ,
स्वप्न टूटने की व्यथा,
पर क्या मनुष्य प्रकृति पर विजय पाया ,
क्या वह मृत्यु को समझ पाया ,
यही प्रश्न मेरे मन में आया ,पर जवाब नहीं पाया
दुःख के दरिया में गोता लगाती , सखी को मैं समझाया
आंखों के आंसू को पुंछवाया ,
पर मेरे मन के अशांत कोने में दबी वह दर्द भी बाहर आयी
जिसे मैंने दुनिया से है छिपाई,
 बस यही कह पाया यह फूल क्यों मुरझाया

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