मंगलवार, 23 मार्च 2010

भौतिक दूरी है जरूरी

कभी कभी दिलो को जोड़ने के लिए दूरी भी जरुरी होती हैयह विचार कुछ लोगो को जरूर अटपटा लगेगापर जो प्यार करते है और वे जरुर जानते होंगेक्योंकि उनेहे उस प्यार का महत्व तब तक पता नहीं होता है जब तक वोह उस प्यार से दूर हो जायेऐसा हो जाने पर ही वह उसका क़द्र जान पाते हैसोनी को महिवाल के प्रेम का तब तक पता नहीं चलता या फिर उसे अपने प्यार को पाने की तड़प नहीं जगती जब तक दुनिया वाले उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं करतेयही नियम दोस्तों पर भी लगती है दोस्त को दोस्त के महत्व का तब तक पता नहीं चलता जब तक वह दूर चला जायेठीक इसके विपरीत अगर कोई लबे समय तक साथ हो और उनके मध्य इतनी घनिष्ठता उत्पन हो जाये की वह एक दूसरे के पूरक हो जाये तो दरार आने में देर भी नहीं होतीक्योंकि जिसे एक मित्र , मित्रता का सहज प्रकटीकरण मानता है वोही दूसरा इसे अपनी निजता का हनन मान सकता है या फिर उसे किसी और रूप में व्याख्या कर सकता हैजो साधारणत होता हैअगर शीर्षक का और व्यापक विशलेषण करे तो पाएंगे की पूरी दुनिया में तनाव का बढ़ना उद्योगिक क्रांति के बाद ज्यादा भयंकर तरीके से हुआ हैसंस्कृतियो के मध्य मतभेद इन्टरनेट क्रांति के बाद ज्यादा साथ पर दिखाउद्धरण के लिए आज से ५० साल पहले इस्लाम का

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

महिला आरक्षण एक नई पहल

भारतीय लोकतंत्र का सबसे सुनहरा दिन ९ मार्च का था। जब भारतीय उच्च सदन राज्य सभा ने १४ साल से लंबित ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण बिल 1 विरोध के मुकाबले १८६ के समर्थन के साथ पास कर दिया, हालांकि इस बार भी कुछ पार्टियों ने खास तौर पर यादवो की तिकड़ी लालू, मुलायम, और शरद यादव ने मिल कर इसका जोरदार विरोध किया। विरोध इतना किया की संसद की मान मर्यादा को भी ताक पर रखने में परहेज नहीं किया। उनका विरोध खास तौर पर पिछड़ी महिलाओ और मुस्लिम महिलाओ को भी इसमें कोटा के मांग को लेकर था। ऊपरी तौर पर यह मांग एकदम जायज लगती है। क्योंकि पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओ खास तौर पर मुस्लिम महिलाओ के प्रतिनिधित्व के बिना देश के लोकतंत्र को सफल नहीं बनया जा सकता है। पर सिर्फ कोटा के अन्दर कोटा के मुद्दे को लेकर एक नव शुरुआत को ही रोक देना ठीक वैसे ही है जैसे गरीबी को एक साथ मिटा पाना मुस्किल हो तो उसके लिए योजना बनाना ही छोड़ देना। जहां तक यादव तिकड़ी की बात है तो मुस्लिम महिलाओ के अधिकार के लिए जो कृदन है वह कोरी राजनीति और बिल को रोकने की कोशिश के अलावा कुछ भी नहीं। अगर वास्तव में वह इन वर्गों के हितैषी थे तो इनकी पार्टी में केवल राबड़ी  देवी,दिम्पल यादव , और जय परदा के अलवा उन्होंने किसी और को क्यों मौका नहीं दिया। अगर वह असली में मुस्लिम महिलाओ के हितैषी थे तो उन्होंने शाह बनो के अधिकारों के लिए जिसे सुप्रीम क मान्यता दे चुकी थी क्यों नहीं आगे आएं।

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...