भीड़ में तनहाई में मै अकेला ,जज्बातों के पहरे में मै अकेला ,
साँझ की बेला में मै अकेला , रात के सपनो में मै अकेला ,
जिंदगी की हर मोड़ पर मै अकेला , इस अकेले राह पर मै ये सोचता हूँ ,
पथिक कोई साथ होता, स्वप्न डगर में उसका का हाथ होता ,
पर क्या यह है मुमकिन? विधाता इतना है सनदिल,
राह चलते उसने छिना , प्रियतमा का हाथ,
हाथ छुटा स्वप्न टूटा , टूट गये अरमान ,
आह निकली , आस फिसली , बह गये अश्रु धार ,
पर कोई नहीं समझा , मेरे मन के चीत्कार,
त्रेता का मै हनुमान नहीं , जो कलेजा चिर दिखाऊ,
नहीं मै राम की गम को दिल में छुपाऊ,
पर न कोई राह है, न कोई मंजिल ,
बस चलता हूँ क्योंकि चलना ही है जिन्दगी , पर गम में न संघी है , न साथी,
फिर भी भीड़ में तनहा ही चले जा रहा हूँ ।