शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

मोदी की जीत पर हो हल्ला क्यों?

गुरुवार को गुजरात में मोदी को मिली जीत के  बुद्धिजीवी अलग अलग मायने निकाल रहे हैं। कोई कह रहा मोदी की पकड़ जनता में थी ,कोई कह रहा है की एक दशक के बाद भी मोदी गुजराती जनता को भ्रमित करने में कामयाब रहे। कुछ कह रहे हैं कि दोनों पार्टियो को नकारने के बावजूद गुजरात की जनता के पास विकल्प नहीं था। इसलिए इन बुधिजीविओ के शब्दो में साम्प्रदायिक शक्तिओ को  फायदा हुआ। कुछ खुद को आलोचकों की प्रथम श्रेणी में रखने के लिए एक कदम और बढ़ गए और रोजाना लोकतंत्र की बड़ाई में घिसती जुबान को अचानक यह व्यवस्था ही नागवार गुजरने लगी। पर भले कुछ भी कहे लोकतंत्र और मेरे शब्दों में भीड़तंत्र में संख्या ही मायने रखती है चाहे मन माने  या न माने । और मोदी उस भीड़तन्त्र के नियमो के अनुरूप जीत हासिल करने में कामयाब हुए हैं और ऐसे में किन्तु और परन्तु बेमानी है। 
जहां  सांप्रदायिकता की बात है तो ये बुद्धिजीवी शाहबानो के साथ क्यों नज़र नहीं आते। क्यों स्वर्ण मंदिर में बब्बर खालसा नेता के बन रहे स्मारक का विरोध करने में इनकी जुबान कांपती है। दरअसल तब तो ये  मूकदर्शक बन जाते है। 2002 में गोधरा में ट्रेन जलने की घटना न ही जायज ठहराई जा सकती है न ही उसके बाद हुए गुजरात दंगो को। यह अलग बात है की कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगो ने बनर्जी आयोग के रिपोर्ट के जरिये गोधरा को एक तरह से जायज ठहराने की कोशिश की थी। पर मोदी को इसका श्रेय नहीं देना चाहिए की असम, बरेली, कोसी कला जैसे  में हुए भयंकर दंगो के असर से गुजरात को मोदी बचने में सफल हुए। लेकिन जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो उसे बाकी चीजे नहीं दिखती, जिस तरह से कुछ लोग ब्रांड देखते हैं गुणवत्ता नहीं वैसे ही सेक्युलर वादी छवि देखते है काम नहीं। पर जनता सब जानती है और जब फैसले देती और उनके पक्ष में देती है तो जनता महान, नहीं तो बेवकूफ।  यह सही है की  एक गलत को दूसरी गलती से नहीं सही ठहराया जा सकता। पर दूसरे पक्ष पर साधी गयी चुप्पी निष्पक्षता के दावे को तार तार जरूर करता है। और लोकतंत्र की यह नियति है की किसी भी फैसले की अच्छाई  या बुराइ नहीं देखी  जाती अगर ऐसा होता। 

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

निर्गुण


काया के पिंजरवा छोड़ी , गइनी हम परदेश
बाबा मोरा अतना निर्मोही,  पिंजरवा तुरंते  देहले फेंक
आजू तक हम न जननी एकर कौनो भेद
एक ओर बाबा के हिय दहले, दूजे पिंजरवा फेंके अपनही गईले
घरवा के लोग बाग़ अंखिया से ता रोये, पर पिंजरवा रखे के केहू न कहे
आजू हम जननी पिंजरवा रे तोर मोल
जब एमे सुगा रहे , बाबा माई आपण कहे,
जस्ही सुगा उडी गईले , पिंजरवा फेंके खातिर उहे कहे,
पिंजरवा में जब सुगा रहे, तब ओकरा के सभे सुने,
लेकिन देखीं किसान रीत , आज उहे पिंजरवे से डरे,
जे पिंजरवा के चूमे, आज उहे गंगाजल पिए,
कहे छुई हमके भेल अपवित्र
हाए, जब तक सुग्नावा पिंजरवा में रहे, सभे ओके घरे रखे
आज पिंजरवा घरे त का बहरवो न रखे
ऐसन रीत देखि मन से मोहे माया छोड़े

_ धीरज कुमार
यह उन लोगो को समर्पित है जो अपने के जाने से शोक में दुबे है और जगत मुसाफिर खाना की उस बंदिश के अर्थ को सायद समझ नहीं प् रहे हैं.

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

जिस्म नहीं इश्क की मंजिल

जिस इश्क की मंजिल जिस्म हो ,
 खुदा करे वह इश्क मुझे कभी न हो
जहाँ जुबान से जज्बात बनते हो,
अल्लाह करे उस इश्क की फरियाद मैं कभी न करू
क्योंकि,
सच्चे इश्क में  जिस्म से ज्यादा रूह करती है काम
अगर यह सच न होता, तो बादशाह अनारकली की जिस्म को चांदी से तौल देता
मंजनू एक अदद जिस्म के लिए यूं दुनिया वालो दुश्मनी न मोल लेता ,
ज़माने में और भी फ़साने हैं , जहाँ जिस्म से ज्यादा जज्बातों के परवाने हैं ,
अगर जिस्म इश्क का मकसद होता,
तो कृष्ण को इसकी क्या कमी थी,
रुकमनी से लेकर सोलह हज़ार रानी सामने खड़ी थी,
पर कृष्ण को राधा भाई, रयान की पत्नी होते हुए भी कान्हा की कहलाई,
वजह थी साफ़, दोनों की रूह थी आत्मसात,
पर नए ज़माने के इश्क्बाजों  को कौन समझाए,
जो जिस्म को इश्क की इबादत मानते है,
न मिले जिस्म तो मेट्रो से कूद जाते हैं,
इश्क के नाम पर अपनों के भी खून करने में एक पल न गवाते हैं,
हाँ, कुछ लोग मेरे जज्बात को जाहिल कहने के लिए खड़े हैं,
कुछ मुझे सनकी साबित करने पर तुले हैं,
एक महाशाए तो इससे भी आगे बढे हैं. इश्क को पुरुष तंतु से जोड़ गए हैं,
यदा- कदा तीखी टिपण्णी करते है
पर मुझे इससे क्या, सच्चाई तो कहना ही था, कृष्ण को  नीतिवान होकर भी मरना ही था,
सो मैं भी तयार हूँ, तर्कों के काँटों पर सवार हूँ. आओ  करो हमले, हम जवाब देंगे,
फिर भी इश्क को जिस्म की मंजिल कभी नहीं कहेंगे
हम इश्क को मानते पाक. जिसमे जिस्म की नहीं होती है सौगात.
(नोट : यह उन लोगो के लिए समर्पित है जो इश्क को सिर्फ शारीरिक मिलन का पर्याय मानते है. और जब मिलन संभव न हो तो इश्क की नाकामी मान जिंदगी से हार बैठते है. पर असल प्यार तो रूह से होती है जो सरीर के चिता में जल जाने के बाद भी कायम रहती है.)

शनिवार, 25 अगस्त 2012

चेहरे पर लगे मुखौटों की कहानी


जीवन में हंसी को ख़ुशी का पैमाना माना जाता है। पर क्या वास्तव में यह पैमाना जीवन की सही तस्वीर पेश करती है?  शायद नहीं! हम बचपन से पचपन और शायद कब्रगाह में जाने तक  चेहरे पर मुखौटा लगाए रहते है। कभी किसी की मौत पर दिल से दुःख न  होने पर भी गम का मुखौटा। कभी पेट में भूख की आग लगी होने पर तृप्त होने का मुखौटा। कभी दिल में दर्द का नासूर होने पर भी खुशी का मुखौटा। सारी जिंदगी हम असली चेहरे को छुपाने के लिए  मुखौटे का ही तो सहारा लेते हैं। कभी भी इस मुखौटे को हटाना गवारा नहीं है। यहाँ तक की जिस उदर से पैदाइश होती हम उस से  भी अपना असली चेहरा नहीं दिखाते हैं। अगर असली चेहरा दिखाते तो मां बाप अपनी ही औलादों से धोखा खाने से बच जाते।
 बड़े शहरों का तो हाल और भी बेहाल है। ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले एक से अधिक चेहरे लगाने में माहिर हैं और इन मुखौटों को बदलने की गति इतनी तेज होती की खुद उनका जमीर ही गचा खा जाए। जिन्दगी भर की दोस्ती के मुखौटे को कुछ पल में  हरी हरी नोटों के लिए दुश्मनी में बदल देना रोजमर्रा की बाते हैं। पेट में भूख की आग को शांत करते वक्त सामने वाले को एहसास ही नहीं होता की मुस्कुरा कर जो होटल का बैरा खाना परोस रहा उस बन्दे की पेट में भी वही आग लगी है, जिसे शांत करने के लिए वह आया है। यहाँ चेहरे पर लगे मुखौटों को इतनी बारीकी से लगाया गया ही की दोस्ती में दुश्मनी के भाव लिए चेहरे का अंदाज़ा ही नहीं होता है। रिश्तो की मिठास के भीतर के जहर का भान ही नहीं होता है। और शायद खुद धोका खाने वाला भी इन मुखौटों को नज़रन्दाज करता है क्योंकि खुद उसका चेहरा कौन सा मुखौटों से ढाका नहीं रहता है। इसलिए हंसी गम को गुमराह करने का एक फलसफा हो पर इसकी गारेंटी नहीं की वह सही रास्ते पर कभी नहीं आयेगी। हाँ दिल के भाव को मुखौटों में छिपाने से सामने की बेरुखी से बचना जरूर आसान हो जाता है.

बुधवार, 8 अगस्त 2012

माँ आज भी याद है मुझे वह दिन

हे मां तुम्हे तो याद होगा , आज ही के दिन तो तुम गई थी।
वेदना के डगर पर इस संतान को छोड़कर कर
मैं तो हनुमान नहीं, जो स्वर्ग  से तुम्हे बुला लाता
न ही मै राम हूं,जो पिता की वाणी के आगे उनके शरीर को भी भूल जाता
मै तो एक निरीह प्राणी था,
जो हताश, निराश आंखों के धार से छोड़ चुके तुम्हारे शरीर को नहला रहा था,
वेदनाओ की वेदी पर दुनिया की नजरो से खुद के जज्बातों को छिपा रहा था
शायद तुम सो रही थी, या शरीर के बंधन को तोड़ मुझसे बिछड़ने पर कही दूर रो रही थी
पर दुनिया की रीती निति से मजबूर, हृदय के आवेगे को रोकने से मजबूर ,
 मां तुम्हारी काया को सुरक्षित रख न सका, समा गई तुक चिता के दवानल में,
पर मां मैं भी क्या करता, तुम इतनी गहरी निद्रा में सो गई थी,
मेरे दिल में जिन्दा रहकर भी, दुनिया के जिस्म को छोड़ गई थी,
उस घड़ी को बीते हो गए दस साल, पर मुझसे पूछो किस दिन नहीं आई याद,
दुनिया की नजरो से छिपा, आंखों के दो बूंद बर्बाद न किया,
मुझे दुःख है, मां तुमने मेरा इंतजार नहीं किया, दिन के उस पहर में मेरा इंतजार न किया,
मैं स्कूल से आ जाता, तो हम कर लेते दो बात,
पर तुमको जल्दी थी, सो तुम छोड़ चली,
कहते है जीवन के दरिया में आता है यौवन की बाढ़ , तब मां बनती है कगार,
पर तुमने वह मौका भी मुझे नहीं दिया,
उमंग के ऋतू में तुमने मुझे अकेला ही छोड़ दिया,
पर मां मेरा भरोसा करो, मै बहका नहीं, सहका नहीं,
हां, जीवन के उमंग से नाता जरूर तोड़ लिया,
यौवन के जल को आंखों में ही भर लिया,
मुझे याद है आज भी हरी हरी वो चुडि़या, जिन्हें चच्ची ने तुम्हे विदाई पर पहनाई थी
मां, मुझे याद है वो इत्र की सिशिया , जिसे तुमने आखिरी बार लगाई थी
मां, भले मै तुम्हारे कहे अनुसार रोज हंसता हूं,
पर सच पूछो मां मै हर हंसी के साथ रोता हूं, अगर तुम एक बार मिल जाती
तो मैं तुम्हें बताता , कैसे मुझे रात की सताती,
कैसे सिरहाने तुम्हे न पाने पर मन याकुल होता ,
हाँ, कभी -कभी आंखों के कगारों को तोड़ देती हैं दो बूंदे,
पर मैं ने इसे छिपाना सिख लिया है, तुम्हारे बिना जीवन जीना सिख लिया है,
पर क्या इससे मिलने की इच्छा कम होगी ,
क्या आंचल की बेरुखी से जज्बातों के टूटने से हुई गम की आग कम होगी
शायद नहीं मां, पर नियति से कौन पार पा पाया है , तुमने ही मुझे समझाया था
उसी का पालन कर रहा हूँ , दर्द है फिर भी हंस के जिए जा रहा हूं
 पर अब मेरी परीक्षा न लो सपनो में ही सही एक बार तो मिल जाओ


शनिवार, 23 जून 2012

छद्म सेकुलरवाद एक और बयार

मोदी को प्रधानमंत्री बनने की खबर आते ही छद्म सेकुलरवादियो को  छिंके  आने लगती है। वह  २००२ के गुजरात दंगो की दुहाई देने लगते हैं। कुछ फेसबुक के मनीषी भी उनका साथ देने लगते है और चिंघाड़ मारते जैसे देश एक पल में गृहयुद्ध में चला जाएगा। पर वो भूल जाते हैं की देश में ज्यादा दंगे तथाकथित सेकुलर हुकुमतो में ही हुआ है।  लेकिन उनपर कोई सवाल नहीं उठाता है। कम से कम इस मामले में हमारा देश तो निराला है। हम लकीर का फकीर पीटना नहीं भूलते। निश्चित तौर से किसी भी दंगे को जायज नहीं ठहराया जा सकता है फिर चाहे वो भागलपुर के दंगे हो या १९८४ के सिख दंगे या गुजरात के दंगे। पर समस्या तब आती है जब हम एक पक्ष के दुःख को अन्याय कहते हैं और दूसरे पक्ष के गम को नियति। कुछ यही मामला गुजरात में भी हुआ। इस दंगे की पृष्ठभूमि में गोधरा था। २७ फ़रवरी की घटना के बाद सोमनाथ ने इसके लिए कारसेवकों को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। लालू के निर्देश पर बनर्जी कमीशन रिपोर्ट में कहा गया डिब्बो में भीतर से लगी आग। उसे सभी ने पचा लिया जिसने विरोध किया वो सांप्रदायिक हो गया। तीस्ता को भी यह याद नहीं आता। गुजरात दंगो में मारे गए लोगो की जाँच करा खुद सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है पर उन कारसेवको का क्या जिन्हें मौत के बाद लुटेरा तक करार दिया गया। क्या उनके बच्चो को यह अधिकार नहीं है की उन्हें न्याय मिले। निश्चित रूप से गुजरात दंगे हिंदुस्तान के इतिहास का काला अध्याय है। पर इस अध्याय से पहले भी कई अध्याय लिखे गए हैं। कश्मीर से हिन्दुओ का पलायन कश्मीर का मामला मान कर नहीं छोड़ा जा सकता। इस आन्दोलन में सक्रिय रहने वाले हुर्रियत को सरकार सुरक्षा देती है। पर कश्मीरी पंडितों के मामले पर कोई सवाल नहीं क्योंकि वोट की फसल उनकी इतनी ज्यादा नहीं है इसलिए बे सहारा है। कुछ यही हाल सिखों का है। इसलिए सभी के न्याय की बात होनी चाहिए और सेकुलरवाद की जागीर किसी एक पक्ष के समर्थक को ही नहीं दी जानी चाहिए। 

गुरुवार, 24 मई 2012

हम उस देश के वासी हैं जहाँ क्रांति नहीं होती


पेट्रोल के दाम को सरकार ने बढ़ा दिया इससे लोग क्रोधित हैं। कुछ जगहों पर लोग प्रदर्शन कर रहे हैं,  पर कितने दिनों तक? शायद तीन दिन तीन सप्ताह या तीन महीने।  इसके बाद फिर हम निराश हताश होकर इस बढ़ोतरी को नियति मान कर अपने घरो में शांत बैठ जायेंगे। समस्या भी हमारी यही है, हम किसी काम को जोर शोर से शुरू तो करते है पर उसे किसी  मुकाम तक पहुंचाना हमारी फितरत नहीं। हमारे यहां पनपने वाला गुस्सा फ्रांस और रूस की तरह क्रांति का रूप नहीं ले पता है। नही तुर्की की तरह अमूल चूक परिवर्तन का रास्ता बना पता है। यही वजह है की देश में लोकतंत्र कहलाने वाली हुकूमते भी सामंतवादी सत्ता चलाने से बाज नहीं आती हैं।
यही वजह है की असली तारणहार नेता भी दीर्घकालिक परिवर्तन की बात करते है बजाय की व्यवस्था के ओवर हॉलिंग के। इतिहास में ऐसे तमाम उदहारण है। आज से करीब  ढाई हज़ार साल पहले बुद्ध की ही बात करें।  वह वैदिक धर्म के आडंबरो को खत्म करने के लिए निकले थे,बदलाव की अलख क्रांति के रूप जगाने का प्रयास किया पर उनके अनुयायियों ने ही बुद्ध में देवत्व स्थापित कर बदलाव की धारा को रोक दिया। यही हाल अशोक का भी रहा वह निकले तो थे बल के साथ पूरे जम्बूद्वीप पर कब्ज़ा करने के लिए, पर एक ही कलिंग युद्ध में उके इरादों को ऐसा झटका लगा की की वह क्रांति की तरह एक झटके में देश पर कब्ज़ा करने के इरादे को छोड़ कर धर्म की धीमी प्रक्रिया अपनाने के लिए मजबूर हो गए।
गांधी युग पर भी चर्चा कर लेते है एक विशेष विचारधारा का इतिहासकार गांधी जी को भारत की आज़ादी की लड़ाई का अग्रदूत मानते हैं। उनका कहना है की गांधी का देश की राजनीती पटल पर आना एक क्रांति है। अगर वास्तव में आज़ादी गाँधी और नेहरु से मिली तो फिर अफ्रीकी देशो को उसी दशक में आज़ादी कैसे मिली। दरअसल आज़ादी, भारत में हुई क्रांति नहीं बल्कि अंग्रेजो की कमजोरी का नतीजा है।  विषय से विष्यांतर नहीं होते और विषय पर आते है। अभी भी मेरा एक ही सवाल है की आखिर हमारे देश में क्रांति क्यों नहीं होती? एक और उदहारण ले ले  तो आजाद हिंद फौज को भी ले सकते है। जे पी आन्दोलन का हश्र देख लो। बहुत दूर कहा जा रहे है अन्ना को भी देख लें। उनके आन्दोलन की शुरुआत जिस उत्साह से शुरू हुई क्या उसी उत्साह से अपने मुकाम पर पहुंच पाया। जवाब मिलेगा नहीं। इससे साफ़ है की हम में क्रांति का बूता नहीं है  क्योंकि हम गुलामी हमारी मानसिकता में है।
यही कमजोरी देश की हुकूमत चला रही सरकार समझती है। वह जानती है की इस देश में क्रांति (क्रांति का अभिप्राय माओवादी रिवोल्यूशन से कतई नहीं है) का माद्दा नहीं कुछ घंटो की चिलम पो के बाद जनता तो खामोश हो ही जाएगी। ज्यादा से  ज्यादा लोक सभा में सत्तारूढ़ पार्टी को विपक्ष की सीट पर बै दिया जाएगा। लूटने का मौका तो तब भी मिलता ही रहेगा क्योंकि इस मामले में राजनीतिक बिरादरी में गजब की एकता है।
पर अब यह तस्वीर बदलनी चाहिए . अब क्रांति होनी चाहिए देश की जनता की  नाम पर  उन्हें ही चलने वालो को चौराहों पर खड़ा कर हिसाब मांगना चाहिए। 

रविवार, 20 मई 2012

आधिकारिक रूप से सठिया गई है संसद


13 मई को देश की संसद आधिकारिक रूप से सठिया गई। इस मौके पर सांसदों ने जश्न मनाया और हमें भी देश में लोकतंत्र की जड़ मजबूत हो रही है इस मुगालते के साथ उन खुशियों में शरीक होता हुआ दिखाया। पर वास्तव में संसद के साठ साल जश्न मनाने के लिए उपुक्त था? वह भी तब जब लोकतंत्र की दुहाई देने वाले सांसदों को आज से साठ साल पहले बनाए गई कार्टून का किताब में छापना नागवार गुजर रहा था। क्या यही लोकतंत्र की मजबूत जड़े हैं जहां अभिवयक्ति की स्वतंत्रता को खुद चुने हुए सांसद मर्दन करने के लिए उतारू हैं। कहते है लोकतंत्र में सांसद लोगों का प्रधिनित्व करता है, क्या हमारे सांसद को देख कर ऐसा कहा जा सकता है? निश्चित तौर पर नहीं।  हमारी सांसद और फ्रांस के बुर्जुआ वर्ग में कोई अंतर नहीं है। हमारे संसद में भी ठीक उसी तरह आम लोगो की रोटी को लूटने वालों पर खामोशी बरती जाती है, तो जनगारूक प्रतिनिधि का आपके हितों के लिए काम करने वाले संसद की छवि भ्रम से अधिक कुछ नहीं है।
वास्तव में यह दिन जश्न मानाने का नहीं मंथन करने का है। आखिर कैसे एक ओर गरीब जनता और  गरीब होती जा रही और सांसदों का बैंक बैलेंस बढ़ता जा रहा है? क्यों भ्रष्ट सांसदों को संसद विशेषाधिकार का कवच प्रदान करती है।  ऐसा नहीं है यह समस्या नया है। आजादी के महज दो साल के भीतर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के नाक के नीचे जीप घोटाला हो जाता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौर में यह कुप्रथा अपने चरम पर पहुंच जाती है और वह कौरव सभा की तरह भारतीयों की कमाई का द्रोपदी की तरह चीरण होने पर आंखे बंद कर देखते रह जाते हैं।
ऐसे में जनता को ठगने और कुछ मुट्ठी भर लोगों के हित साधक बन चुकी संसद की विश्वसनीयता का क्षीण होना आश्चर्यजनक नहीं है। इसलिए संसद को तय को अपने स्तर पर अग्निपरीक्षा देनी है। उसे साबित करना है कि उसके द्वारा बनाए गए कानून का पालन बाहर की जनता नहीं संसद के भीतर सांसदों को भी करना होता है और वे इसमें आदर्श हैं।


रविवार, 8 जनवरी 2012

भारतीयों की कमजोरी का सबूत लोकपाल का टलना

लोकपाल का हल्ला बोल आन्दोलन लगभग मृतप्राय हो गया है। नेता भी अब चैन की सांस ले रहे है। अन्ना भी मुंबई में भीड़ न जुटने से कुछ ज्यादा ही निराश हैं। ऊपर से शांतिभूषण पर कोर्ट का फरमान की वह जुर्माना भरे और इस बीच किरण बेदी पर लगते छोटे मोटे भ्रष्टाचार के आरोप। इससे कई लोगो का मानना है की अन्ना का जादू अब लोगो के सिर से उतर चूका है। वाशिंगटन पोस्ट अख़बार में वहां के रिपोर्टर ने भी इस आन्दोलन को लगभग कांतिहीन होता बताया है, तो क्या अब लोकपाल का सपना सपना ही रह जाएगा. क्या फिर से भारत की जनता को और चालीस साल ऐस कानून का इंतजार करना होगा। शायद हां क्योंकि अब हम अन्न को ठीक से नहीं सुनते अब हम में उबाल नहीं आता है। 
 यह हमारी सबसे बड़ी पुराणी बीमारी है हम किसी अच्छे मकसद के कोई काम तो शुरू करते हैं। लेकिन जल्द ही हार मान कर अपने घरो में बैठ जाते है। यही कारण है की नेता भी मामले को कुछ हवा देने के बाद टालने में कामयाब हो जाते है। हम किसी चीज को अंजाम तक नहीं पहुचाते है। उदहारण दूं तो शब्द कम पड़ जायेंगे। भारत की क्रिकेट टीम उसी का उदहारण पेश कर रही है।  हमने लोकपाल की लड़ाई तेज की और उसके बाद हम नेताओ की चाल में फंस गए । कोई मुस्लिम के लिए आरक्षण मांगने लगा तो कोई दलितों के लिए, कोई इसकी जरूरत पर ही प्रश्न चिन्ह लगाने लगा और हम शांत होकर सुनते रह गए।  कुछ इसी सोच की वजह से हमे अंग्रेजो से आज़ादी पाने के लिए 90 साल का लंबा संघर्ष करना पड़ा। इसलिए अब हमे सहनशीलता का झूठा चोला फेंक कर और नपुंसकता (केवल अक्रियाशीलता के संदर्भ में) छोड़ कर लोकपाल के लिए आंदोलन को मजबूत करना चाहिए। एक बात आपको भी पता है की क्रांति से तत्कालिक बदलाव होता है, लेकिन उसे स्थायी बनाने के लिए निरंतर जागरूक रहना पड़ता है। तो मेरी जनता और खास तौर से युवाओं से आह्वान है की वह सत्ता में अपनी ताकत दिखाए और देश हित में उन शक्तियो को उखाड़ फेंके चाहे संवेदनहीन स्थापित सत्ता केंद्र ही क्यों न बह जाए। क्योंकि मात्र 64 साल में ही हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था में सड़ांध आ गई है, जिसे बिना कड़वी दवा दिए ठीक नहीं किया जा सकता है और यह कड़ी दवा जन जागरूकता और तकनीक की तहकीकात से ही संभव है। 


शनिवार, 7 जनवरी 2012

कमरे में सिमटी जिंदगी

कभी हर काम के लिए कमरा होता था,
अब हर काम एक कमरे में होता है.
कभी चाहने वालो की भीड़ होती थी,
अब भीड़ में भी नहीं होता कोई चाहनेवाला .
कभी दोस्तों के झुण्ड में थे जी चुराते,
अब चाह कर भी नहीं जुटा पाते झुण्ड.
कभी अरमानो को पल भार में बयां कर देते थे,
अब उन्हें बयाँ करने का समय ही नहीं मिलता.
कभी आंसुओ के बिच में हंसी के फवारे छुट जाते,
अब हंसी के फवारो से ही गम छुपाते.
कभी तन्हाई में भी मिल जाता सहारा,
अब सहारा भी तन्हाई में मिलती है.
कभी हम गीत ख़ुशी का ही थे गाते,
अब गम को भी बताने के लिए जज्बात नहीं आते.

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...