गुरुवार को गुजरात में मोदी को मिली जीत के बुद्धिजीवी अलग अलग मायने निकाल रहे हैं। कोई कह रहा मोदी की पकड़ जनता में थी ,कोई कह रहा है की एक दशक के बाद भी मोदी गुजराती जनता को भ्रमित करने में कामयाब रहे। कुछ कह रहे हैं कि दोनों पार्टियो को नकारने के बावजूद गुजरात की जनता के पास विकल्प नहीं था। इसलिए इन बुधिजीविओ के शब्दो में साम्प्रदायिक शक्तिओ को फायदा हुआ। कुछ खुद को आलोचकों की प्रथम श्रेणी में रखने के लिए एक कदम और बढ़ गए और रोजाना लोकतंत्र की बड़ाई में घिसती जुबान को अचानक यह व्यवस्था ही नागवार गुजरने लगी। पर भले कुछ भी कहे लोकतंत्र और मेरे शब्दों में भीड़तंत्र में संख्या ही मायने रखती है चाहे मन माने या न माने । और मोदी उस भीड़तन्त्र के नियमो के अनुरूप जीत हासिल करने में कामयाब हुए हैं और ऐसे में किन्तु और परन्तु बेमानी है।
जहां सांप्रदायिकता की बात है तो ये बुद्धिजीवी शाहबानो के साथ क्यों नज़र नहीं आते। क्यों स्वर्ण मंदिर में बब्बर खालसा नेता के बन रहे स्मारक का विरोध करने में इनकी जुबान कांपती है। दरअसल तब तो ये मूकदर्शक बन जाते है। 2002 में गोधरा में ट्रेन जलने की घटना न ही जायज ठहराई जा सकती है न ही उसके बाद हुए गुजरात दंगो को। यह अलग बात है की कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगो ने बनर्जी आयोग के रिपोर्ट के जरिये गोधरा को एक तरह से जायज ठहराने की कोशिश की थी। पर मोदी को इसका श्रेय नहीं देना चाहिए की असम, बरेली, कोसी कला जैसे में हुए भयंकर दंगो के असर से गुजरात को मोदी बचने में सफल हुए। लेकिन जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो उसे बाकी चीजे नहीं दिखती, जिस तरह से कुछ लोग ब्रांड देखते हैं गुणवत्ता नहीं वैसे ही सेक्युलर वादी छवि देखते है काम नहीं। पर जनता सब जानती है और जब फैसले देती और उनके पक्ष में देती है तो जनता महान, नहीं तो बेवकूफ। यह सही है की एक गलत को दूसरी गलती से नहीं सही ठहराया जा सकता। पर दूसरे पक्ष पर साधी गयी चुप्पी निष्पक्षता के दावे को तार तार जरूर करता है। और लोकतंत्र की यह नियति है की किसी भी फैसले की अच्छाई या बुराइ नहीं देखी जाती अगर ऐसा होता।
जहां सांप्रदायिकता की बात है तो ये बुद्धिजीवी शाहबानो के साथ क्यों नज़र नहीं आते। क्यों स्वर्ण मंदिर में बब्बर खालसा नेता के बन रहे स्मारक का विरोध करने में इनकी जुबान कांपती है। दरअसल तब तो ये मूकदर्शक बन जाते है। 2002 में गोधरा में ट्रेन जलने की घटना न ही जायज ठहराई जा सकती है न ही उसके बाद हुए गुजरात दंगो को। यह अलग बात है की कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगो ने बनर्जी आयोग के रिपोर्ट के जरिये गोधरा को एक तरह से जायज ठहराने की कोशिश की थी। पर मोदी को इसका श्रेय नहीं देना चाहिए की असम, बरेली, कोसी कला जैसे में हुए भयंकर दंगो के असर से गुजरात को मोदी बचने में सफल हुए। लेकिन जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो उसे बाकी चीजे नहीं दिखती, जिस तरह से कुछ लोग ब्रांड देखते हैं गुणवत्ता नहीं वैसे ही सेक्युलर वादी छवि देखते है काम नहीं। पर जनता सब जानती है और जब फैसले देती और उनके पक्ष में देती है तो जनता महान, नहीं तो बेवकूफ। यह सही है की एक गलत को दूसरी गलती से नहीं सही ठहराया जा सकता। पर दूसरे पक्ष पर साधी गयी चुप्पी निष्पक्षता के दावे को तार तार जरूर करता है। और लोकतंत्र की यह नियति है की किसी भी फैसले की अच्छाई या बुराइ नहीं देखी जाती अगर ऐसा होता।