काया के पिंजरवा छोड़ी , गइनी हम परदेश
बाबा मोरा अतना निर्मोही, पिंजरवा तुरंते देहले फेंक
आजू तक हम न जननी एकर कौनो भेद
एक ओर बाबा के हिय दहले, दूजे पिंजरवा फेंके अपनही गईले
घरवा के लोग बाग़ अंखिया से ता रोये, पर पिंजरवा रखे के केहू न कहे
आजू हम जननी पिंजरवा रे तोर मोल
जब एमे सुगा रहे , बाबा माई आपण कहे,
जस्ही सुगा उडी गईले , पिंजरवा फेंके खातिर उहे कहे,
पिंजरवा में जब सुगा रहे, तब ओकरा के सभे सुने,
लेकिन देखीं किसान रीत , आज उहे पिंजरवे से डरे,
जे पिंजरवा के चूमे, आज उहे गंगाजल पिए,
कहे छुई हमके भेल अपवित्र
हाए, जब तक सुग्नावा पिंजरवा में रहे, सभे ओके घरे रखे
आज पिंजरवा घरे त का बहरवो न रखे
ऐसन रीत देखि मन से मोहे माया छोड़े
_ धीरज कुमार
यह उन लोगो को समर्पित है जो अपने के जाने से शोक में दुबे है और जगत मुसाफिर खाना की उस बंदिश के अर्थ को सायद समझ नहीं प् रहे हैं.