सोमवार, 1 मई 2017

वामपंथ की चुनौती पूंजीवाद नहीं बल्कि कथनी करनी का अंतर

दुनियाभर में अमीर और गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। मजदूरों का शोषण बढ़ रहा है। इसके बावजूद आश्चर्यजनक रूप से सर्वहारा, मजलूमों, गरीबों की उम्मीद के तौर पर उभरी वामपंथी आंदोलन की धार कमजोर पड़ी है। भले वामपंथी साथी स्वीकार न करें, लेकिन वास्तविकता यह है कि उन्हें जितना नुकसान विरोधी पूंजीवादी व्यवस्था ने नहीं पहुंचाया, उससे कहीं अधिक आंदोलन का नेतृत्व करने वालों ने इसकी धार कुंद की।
कोई भी विचारधारा आदर्श रूप में चाहे जितनी आकर्षक क्यों न हो, उसका मूल्यांकन जमीनी क्रियान्वयन पर ही होता है और इस मामले में वामपंथी के लेनीनवादी,स्टालिनवादी, माओवादी और किम जोंग वादी संस्करण असफल हुए हैं। उन्होंने किसानों, मजूदरों और श्रमिकों को सबल करने के आदर्श स्वरूप जब जमीं पर उतारे तो उन्होंने पुरानी व्यवस्था के मुकाबले इस वर्ग को अधिक भयभीत किया। साम्यवाद के विभिन्न संस्करणों ने सैद्धांतिक रूप से राज्य को निमित मात्र मानने के बावजूद इस संस्था को इतना शक्तिशाली बना दिया कि वह अधिनायकवादी स्वरूप में आ गया।
शोषण की कुंजी के रूप में कुख्यात राजतंत्र का राष्ट्रवाद कम्युन की अधिनायकवाद के समक्ष बौना साबित हुआ। फर्क बस इतना पड़ा कि राजतंत्र ने जहां राष्ट्र के नाम पर उनकी हड्डियों का चूरा बनाया,वहीं कम्यून में सर्वहारा कल्याण के नाम। कम्युन में विरोध करने के लिए राजतंत्र द्वारा विकसित यातना के क्रूर तरीकों को और परिष्कृत किया गया।
प्रथम विश्व युद्ध में जनसंहार के आरोप में जिस निकोलस द्वितीय को रूस की गद्दी से उतारा गया था, स्टालिन ने उसी अधिनायकवादी रूवरूप में नए सिरे से सर्वहारा का ही संहार किया। बस अंतर इतना था कि इसका खुलासा उसके पदच्युत होने के बाद हुआ।
 राज्य के राजतंत्र स्वरूप में एक राजा और उसके मंत्रियों की सत्ता और संसाधन पर नियंत्रण होता है और इसी परिपाटी को बदल संसाधनों को बांटने के वादे की वजह से सर्वहारा वर्ग साम्यवादी व्यवस्था के प्रति आकर्षित हुआ। लेकिन सत्ता के केंद्र पर पहुंचने के बाद सर्वहारा वर्ग की उम्मीदें टूटी है। बस शब्द बदल गए लेकिन सत्ता का मिजाज वही रहा।
अब राजा नहीं पोलित ब्यूरों के सदस्यों और सत्तारूढ़ दल के समर्थकों को पुराने विशेषाधिकार मिल गए और सर्वहारा फिर हार गया। कई मायनों में यह पूर्व की व्यवस्था से और क्रूर साबित हुई। पहले राजा को केवल हाड़तोड़ मेहनत का कर देना होता था, लेकिन अब किसान की फसल भी कम्यून हो गई। कर देने के बाद बची राशि जो निश्चित तौर पर पर्याप्त नहीं थी, पर उसका अधिकार था जिसे कम्यून ने छिन ली और संसाधन होने के बावजूद राशनिंग प्रणाली लागू कर दी गई, जो एक कृत्रिम व्यवस्था साबित हुई। यही वजह है कि केंद्रीकृत व्यवस्था के कमजोर होते ही यह धराशायी हो गई। यह फ्रांसीसी क्रांति की तरह यह चीर स्थायी नहीं हो सका।
इसके उलट पूंजीवादी व्यवस्था ने अपना चोला बदल लिया। जनकल्याण के कार्यों को आडंबर स्वरूप ही सही अंगीकार किया। उसने मार्क्स के मजदूर कल्याण के सिद्धांतों को भी अपने अनुरूप बनाकर स्वीकार करने में परहेज नहीं किया। यही वजह है कि दुनिया से लाल क्रांति किताबों में सिमटती चली गई और पूंजीवादी व्यवस्था नए चोले में एक बार फिर आच्छादित हो रहा है।
भारत जुदा नहीं 
सोवियत संघ में कम्युनिस्ट के सत्तारूढ़ होने की खबर से गुलाम भारत भी अछूता नहीं रहा और 1924 में संस्थागत स्वरूप में स्थापित हुआ। लेकिन देश की बड़ी आबादी दबी-कुचली होने के बावजूद इसका प्रभावक्षेत्र सिमटता जा रहा है। इसकी एकमात्र वजह कथनी और करनी में अंतर,विकल्प का खाका दिए बिना केवल तकरार को बढ़ावा देना है।
दुनिया में लोकतांत्रिक रूप से पहली बार वामपंथी सरकार भारत के केरल राज्य में चुनी गई और इसमें कोई दो राय नहीं कि इस सरकार को कांग्रेस ने अस्थिर करने की कोशिश की। बवाजूद इसके बंगाल का किला भी लाल हो गया। केरल के मुकाबले बंगाल की उम्मीदें अधिक थी, क्योंकि ब्रिटिश राज और सामंतवादी व्यवस्था के कॉकटेल से था। शायद यही वजह रही कि प्रत्यक्ष रूप से उग्र वामपंथी आंदोलन की आग नक्सलबाड़ी में लगी। लेकिन आंदोलन के मात्र एक दशक के भीतर बंगाल पर वामपंथी सरकार के आगमन और तीन दशक के बाद भी लोगों का आकांक्षाओं का पूरा होना तो दूर मौलिक जरूरतें भी पूरी नहीं हुई। महत्वकांक्षाओं का केंद्र रहा कोलकाता भी धराशायी हो गया।  वामपंथी सरकार पूंजीवादी व्यवस्था की ओर से खिंची गई रेखा के सामने बड़ी रेखा खिंचने की बजाय उस रेखा को अपनी छोटी रेखा से कमतर करने के लिए कृतसंकल्पित दिखी। उत्कृष्ठ संस्थाओं का बड़े पैमाने पर पतन हुआ। कभी बिहार, पूर्वांचल और संपूर्ण भारत के सपनों के शहर रहे कोलकाता को हड़तालों, गंदगी और धरने-प्रदर्शनों के केंद्र में तब्दील कर दिया गया। संसाधनों में समानता के एजेंडे को पूरा करने के लिए जरूरी है कि संसाधन आए, लेकिन वामपंथी सरकार की नीतियों ने संसाधन के सृजन को ही रोक दिया और करीब तीन दशक बाद लोगों ने समझा कि आदर्श के फूल व्यवहार में सुगंध फैलाए यह जरूरी नहीं। यही कारण है कि 2011 में 32 साल का वाम किला धूरधूसित हुआ।
भारत में वामपंथी दलों की समस्या विचारों पर बंदिश भी है। जिस तरह से प्लूटो मानतें थे कि केवल शासक वर्ग को ही फैसले लेने का हक होना चाहिए। उसी प्रकार वामपंथी दल मानते हैं कि पोलित ब्यूरो ही बुद्धिजीवी हैं और उनके विरोधी आवाजों का महत्व नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो 2016 में जगमति सगवान को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता।







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