देश के सबसे भरोसेमंद आभूषण ब्रांड टाटा के तनिष्क के विज्ञापन पर बवाल मचा है और सोशल मीडिया पर ‘लव जिहाद ’ करार देकर बॉयकॉट करने की मुहिम चल रही है। हालांकि, इस तरह का विवाद नया नहीं है। ठीक इसी तरह का विवाद सर्फ एक्सेल द्वारा होली पर जारी एक विज्ञापन पर भी मचा था जिसमें नमाज पढ़ने जा रहे एक बच्चे को रंग लगाने की झलक थी। दरअसल भारत में कंपनियां लोगों का ध्यान आकर्षित कराने के लिए इस तरह का विज्ञापन लाती हैं , लेकिन समाज में एक धड़े में इनका जिस तरह से विरोध होता है उसपर सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है। क्यो ऐसी परिस्थिति बार-बार देश में आती है।
मेरा मानना है कि इसकी जड़े असुरक्षा ,दूसरे पक्ष की तुष्टिकरण और बुद्धिजीवी वर्ग की केवल अपनी विचाराधार की चाकरी में है। राजनीतिक तुष्टिकरणभी उनमें एक है और इसकी जवाबी प्रतिक्रिया हमने वर्ष 2014 में देखी जब भारतीय राजनीति की धुरी ही अल्पसंख्यकवाद से हटकर बहुमतवाद पर चली आई। डॉ.मनमोहन सिंह के मुस्लिमों पर देश के संसाधनों के पहले अधिकार वाले बयान को भाजपा ने जितना भुनाया शायद किसी ने नहीं ,वह बहुमत आबादी (कम से कम चुनावी वैतरणी पार कराने लायक संख्या) को विश्वास दिलाने में कामयाब रही कि वह ही उसकी सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक विश्वास और परंपराओं की हितैषी है। यहीं वजह है कि गत छह सालों में बहुमत आबादी की ओर से ऐसे मामलों पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है जो पहले या तो दृष्टिगोचर नहींथी या फिर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नहीं होता था।
इन विरोधों को सोशल मीडिया ने धार दी है जो गाहे-बगाहे अपनी ताकत का मुजायरा करता है। यह हमने सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद आलिया भट्ट की फिल्म के प्रोमों के मामले में हमने देखा। अब बात करते हैं कि असुरक्षा की, तो वैश्चिकरण में हर समुदाय और धार्मिक समूह की बड़ी चिंता अपनी पहचान को बचाने को लेकर है। उसे लगता है कि उसने अपनी संस्कृति , भाषा और परंपरा को अक्षुण्ण नहीं रखा तो वह नष्ट हो जाएगी। इसी कड़ी में वह कोई बदलाव नहीं स्वीकार करता बल्कि और रूढीवादी हो जाता है। तनिष्क के विज्ञापन और सर्फ एक्सेल के विज्ञापन को इसी संदर्भ में देखा जाता है जब उसे लगता है कि उसकी संस्कृति और परंपरा पर दूसरे की श्रेष्ठता इन विज्ञापनों के जरिये स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। देश के बंटवारे का इतिहास इस भय को अन्य मुल्कों के मुकाबले और बढ़ा देता है।
दूसरी विरोध की वजह तुष्टिकरण है, गत 70 साल में हमारे राजनतिक वर्ग ने अपने -अपने लाभ के लिए किसी न किसी वर्ग का तुष्टिकरण किया। गलत बातों का विरोध नहीं किया। उदाहरण के लिए सलमान रुशदी के साथ सरकार खड़ी नहीं हुई क्योंकि उसे अपने वोट बैंक के खिसकने का डर लगा। वहीं, मौजूदा राजनीतिक वर्ग पद्मावती जैसी फिल्मों के विरोधियों के सामने अड़ नहीं सकी और पद्मावती किरदार के लिबास में जबरन बदलाव कराए गए।
इस रुख ने लोगों को अपने ही हिसाब से चीजों को परिभाषित करने और उससे अगल होने पर सड़क पर तांडव मचाने का अधिकार दे दिया। हालांकि, हमारे देश में विरोध की जो स्याह तस्वीर और राजनीतिक शह मौजूद है , वो शायद कहीं नहीं है।
हालांकि, असुरक्षा के भाव को खत्म करने और तुष्टकरण के ऐब का विरोध करने की जिस बुद्धिजीवी वर्ग की जिम्मेदारी है वह हमारे देश में हमेशा से संदिग्ध रहा और यही वजह है कि उसकी विश्वसनीयता क्षीण होती रही । हमारे बुद्धिजीवी वर्ग ने अपनी विचारधारा की चाकरी करने को तरजीह दी, जैसे दक्षिण पंथी है तो इस विज्ञापन और ओ माइ गॉड जैसी फिल्मों का विरोध करेगा जबकि वामपंथी इसका समर्थन करेगा। वहीं द विंसी को और इनोसेंस ऑफ मुस्लिम का बहुमत से संबंध रखने वाला बुद्धिजीवी वर्ग दबी जुबान समर्थन करेगा लेकिन वामपंथी बुद्धिजीवी या तो चुप रहना मुनासिब समझेंगे या उनकी ही विचारधारा वाली सरकार द्वारा इन्हें प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद अभिव्यक्ति की आजादी की किताब बंद कर उल्टा समर्थन में तर्क देंगे। यही चाकरी देश को ऐसे मामलों में परिपक्व बनाने में सबसे बड़ी बाधा है।
ऐसे में आने वाले वर्षों में यह तस्वीर और स्याह ही देखने को मिलेगी क्योंकि इसका अंत होता नहीं दिख रहा है। हां, एक ऐसा भी वर्ग उठ रहा है जो बुद्धिजीवी नहीं है लेकिन वह मस्तमौला है। उसे इससे फर्क नहीं पड़ता की सर्फ एक्सेल से नमाजी के कुर्ते पर लगे होली रंग के दाग साफ होते हैं या मुस्लिम परिवार में हिंदू बहू की गोद भराई होती है और यही वर्ग वास्तव में सोशल मीडिया हो या अन्य जगह मोर्चा ले रहा है और इनसे ही कुछ उम्मीद बनती है।