शनिवार, 25 अगस्त 2012

चेहरे पर लगे मुखौटों की कहानी


जीवन में हंसी को ख़ुशी का पैमाना माना जाता है। पर क्या वास्तव में यह पैमाना जीवन की सही तस्वीर पेश करती है?  शायद नहीं! हम बचपन से पचपन और शायद कब्रगाह में जाने तक  चेहरे पर मुखौटा लगाए रहते है। कभी किसी की मौत पर दिल से दुःख न  होने पर भी गम का मुखौटा। कभी पेट में भूख की आग लगी होने पर तृप्त होने का मुखौटा। कभी दिल में दर्द का नासूर होने पर भी खुशी का मुखौटा। सारी जिंदगी हम असली चेहरे को छुपाने के लिए  मुखौटे का ही तो सहारा लेते हैं। कभी भी इस मुखौटे को हटाना गवारा नहीं है। यहाँ तक की जिस उदर से पैदाइश होती हम उस से  भी अपना असली चेहरा नहीं दिखाते हैं। अगर असली चेहरा दिखाते तो मां बाप अपनी ही औलादों से धोखा खाने से बच जाते।
 बड़े शहरों का तो हाल और भी बेहाल है। ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले एक से अधिक चेहरे लगाने में माहिर हैं और इन मुखौटों को बदलने की गति इतनी तेज होती की खुद उनका जमीर ही गचा खा जाए। जिन्दगी भर की दोस्ती के मुखौटे को कुछ पल में  हरी हरी नोटों के लिए दुश्मनी में बदल देना रोजमर्रा की बाते हैं। पेट में भूख की आग को शांत करते वक्त सामने वाले को एहसास ही नहीं होता की मुस्कुरा कर जो होटल का बैरा खाना परोस रहा उस बन्दे की पेट में भी वही आग लगी है, जिसे शांत करने के लिए वह आया है। यहाँ चेहरे पर लगे मुखौटों को इतनी बारीकी से लगाया गया ही की दोस्ती में दुश्मनी के भाव लिए चेहरे का अंदाज़ा ही नहीं होता है। रिश्तो की मिठास के भीतर के जहर का भान ही नहीं होता है। और शायद खुद धोका खाने वाला भी इन मुखौटों को नज़रन्दाज करता है क्योंकि खुद उसका चेहरा कौन सा मुखौटों से ढाका नहीं रहता है। इसलिए हंसी गम को गुमराह करने का एक फलसफा हो पर इसकी गारेंटी नहीं की वह सही रास्ते पर कभी नहीं आयेगी। हाँ दिल के भाव को मुखौटों में छिपाने से सामने की बेरुखी से बचना जरूर आसान हो जाता है.

बुधवार, 8 अगस्त 2012

माँ आज भी याद है मुझे वह दिन

हे मां तुम्हे तो याद होगा , आज ही के दिन तो तुम गई थी।
वेदना के डगर पर इस संतान को छोड़कर कर
मैं तो हनुमान नहीं, जो स्वर्ग  से तुम्हे बुला लाता
न ही मै राम हूं,जो पिता की वाणी के आगे उनके शरीर को भी भूल जाता
मै तो एक निरीह प्राणी था,
जो हताश, निराश आंखों के धार से छोड़ चुके तुम्हारे शरीर को नहला रहा था,
वेदनाओ की वेदी पर दुनिया की नजरो से खुद के जज्बातों को छिपा रहा था
शायद तुम सो रही थी, या शरीर के बंधन को तोड़ मुझसे बिछड़ने पर कही दूर रो रही थी
पर दुनिया की रीती निति से मजबूर, हृदय के आवेगे को रोकने से मजबूर ,
 मां तुम्हारी काया को सुरक्षित रख न सका, समा गई तुक चिता के दवानल में,
पर मां मैं भी क्या करता, तुम इतनी गहरी निद्रा में सो गई थी,
मेरे दिल में जिन्दा रहकर भी, दुनिया के जिस्म को छोड़ गई थी,
उस घड़ी को बीते हो गए दस साल, पर मुझसे पूछो किस दिन नहीं आई याद,
दुनिया की नजरो से छिपा, आंखों के दो बूंद बर्बाद न किया,
मुझे दुःख है, मां तुमने मेरा इंतजार नहीं किया, दिन के उस पहर में मेरा इंतजार न किया,
मैं स्कूल से आ जाता, तो हम कर लेते दो बात,
पर तुमको जल्दी थी, सो तुम छोड़ चली,
कहते है जीवन के दरिया में आता है यौवन की बाढ़ , तब मां बनती है कगार,
पर तुमने वह मौका भी मुझे नहीं दिया,
उमंग के ऋतू में तुमने मुझे अकेला ही छोड़ दिया,
पर मां मेरा भरोसा करो, मै बहका नहीं, सहका नहीं,
हां, जीवन के उमंग से नाता जरूर तोड़ लिया,
यौवन के जल को आंखों में ही भर लिया,
मुझे याद है आज भी हरी हरी वो चुडि़या, जिन्हें चच्ची ने तुम्हे विदाई पर पहनाई थी
मां, मुझे याद है वो इत्र की सिशिया , जिसे तुमने आखिरी बार लगाई थी
मां, भले मै तुम्हारे कहे अनुसार रोज हंसता हूं,
पर सच पूछो मां मै हर हंसी के साथ रोता हूं, अगर तुम एक बार मिल जाती
तो मैं तुम्हें बताता , कैसे मुझे रात की सताती,
कैसे सिरहाने तुम्हे न पाने पर मन याकुल होता ,
हाँ, कभी -कभी आंखों के कगारों को तोड़ देती हैं दो बूंदे,
पर मैं ने इसे छिपाना सिख लिया है, तुम्हारे बिना जीवन जीना सिख लिया है,
पर क्या इससे मिलने की इच्छा कम होगी ,
क्या आंचल की बेरुखी से जज्बातों के टूटने से हुई गम की आग कम होगी
शायद नहीं मां, पर नियति से कौन पार पा पाया है , तुमने ही मुझे समझाया था
उसी का पालन कर रहा हूँ , दर्द है फिर भी हंस के जिए जा रहा हूं
 पर अब मेरी परीक्षा न लो सपनो में ही सही एक बार तो मिल जाओ


 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...