जीवन में हंसी को ख़ुशी का पैमाना माना जाता है। पर क्या वास्तव में यह पैमाना जीवन की सही तस्वीर पेश करती है? शायद नहीं! हम बचपन से पचपन और शायद कब्रगाह में जाने तक चेहरे पर मुखौटा लगाए रहते है। कभी किसी की मौत पर दिल से दुःख न होने पर भी गम का मुखौटा। कभी पेट में भूख की आग लगी होने पर तृप्त होने का मुखौटा। कभी दिल में दर्द का नासूर होने पर भी खुशी का मुखौटा। सारी जिंदगी हम असली चेहरे को छुपाने के लिए मुखौटे का ही तो सहारा लेते हैं। कभी भी इस मुखौटे को हटाना गवारा नहीं है। यहाँ तक की जिस उदर से पैदाइश होती हम उस से भी अपना असली चेहरा नहीं दिखाते हैं। अगर असली चेहरा दिखाते तो मां बाप अपनी ही औलादों से धोखा खाने से बच जाते।
बड़े शहरों का तो हाल और भी बेहाल है। ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले एक से अधिक चेहरे लगाने में माहिर हैं और इन मुखौटों को बदलने की गति इतनी तेज होती की खुद उनका जमीर ही गचा खा जाए। जिन्दगी भर की दोस्ती के मुखौटे को कुछ पल में हरी हरी नोटों के लिए दुश्मनी में बदल देना रोजमर्रा की बाते हैं। पेट में भूख की आग को शांत करते वक्त सामने वाले को एहसास ही नहीं होता की मुस्कुरा कर जो होटल का बैरा खाना परोस रहा उस बन्दे की पेट में भी वही आग लगी है, जिसे शांत करने के लिए वह आया है। यहाँ चेहरे पर लगे मुखौटों को इतनी बारीकी से लगाया गया ही की दोस्ती में दुश्मनी के भाव लिए चेहरे का अंदाज़ा ही नहीं होता है। रिश्तो की मिठास के भीतर के जहर का भान ही नहीं होता है। और शायद खुद धोका खाने वाला भी इन मुखौटों को नज़रन्दाज करता है क्योंकि खुद उसका चेहरा कौन सा मुखौटों से ढाका नहीं रहता है। इसलिए हंसी गम को गुमराह करने का एक फलसफा हो पर इसकी गारेंटी नहीं की वह सही रास्ते पर कभी नहीं आयेगी। हाँ दिल के भाव को मुखौटों में छिपाने से सामने की बेरुखी से बचना जरूर आसान हो जाता है.