प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार
कोरोना महामारी की इस दूसरी लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाखों मौतों से इनकार नहीं किया जा सकता। सरकारी दावों के विपरीत श्मशानों में अनगिनतत चिताओं की धधकती आग और कब्रिस्तानों में दिन-रात खोदी जा रही कब्रें स्थिति की भयावहता को बेपर्दा करती है लेकिन जिस तरह से गंगा नदी और खासतौर पर प्रयागराज में गंगा नदी के किनारे शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग गरीबी के तड़के के साथ की जा रही है वह सांस्कृतिक व्यभिचार से अधिक कुछ नहीं।
मैं स्वयं जीवन के 35 बसंतों में 25 बसंतों को गंगा-यमुना के दोआब में रहते हुए गुजरते देखा है और यहां की माटी- संस्कृति से पूर्ण तो नहीं लेकिन काफी हद तक परिचित हूं। यह सवाल जायज हो सकते हैं कि हजारों मौतों को सरकार क्यों छिपा रही लेकिन उनके दफनाने पर सवाल और गरीबी का हवाला, केवल अज्ञानता या प्रोपगेंडा ही हो सकता है बल्कि यह भी ‘सांस्कृतिक ब्राह्मणवाद’ का प्रयाय है जिसमें एक ही परंपरा, मान्यता एवं विश्वास को श्रेष्ठ मानकर बाकी को हीन दृष्टि से देखा जाता है।
प्रयागराज की बात करें तो यहां कई जातियों में परंपरा रही है कि शवों को केवल पांच जगह पर उसकी संतान द्वारा दाग कर दफना दिया जाता है और यह कर्म अगर गंगा के किनारे हो तो सर्वोत्तम माना जाता है। निश्चित तौर पर इस परंपरा की पृष्ठभूमि को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं लेकिन उन जातियों की यह परिपाटी रही हैं। ऐसे में उनकी इस परंपरा को गरीबी से जोड़ हिकारत से देखना उनकी संस्कृति से व्यभिचार नहीं है तो क्या है।
प्रयागराज के फाफामऊ पुल के पास और श्रृंगश्वेर धाम पर गंगा के किनारे शवों को दफनाने की परंपरा रही है और ये शव फतेहपुर, कौशांबी, प्रतापगढ और जौनपुर तक लाए जाते रहे हैं और करीब एक साल तक या जबतक गंगा उसे सपाट नहीं कर दे कब्रों पर चादर, फूल आदि चढ़ाने की परंपरा रही है। ठीक वैसे ही जैसे काशी में प्राण त्यागने देश भर से लाेगे आते हैं और बिहार तक शवों को मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए लाए जाते रहे हैं। इऐ कथित आधुनिक सोच वाला धड़ा एक पुरापंथी विचार वाला कर सकता है लेकिन क्या जो इनका अनुपालन करते हैं उन्हें अपनी सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने का हक नहीं है?
आज मीडिया की रिपोर्टिंग की वजह से इस परंपरा का निर्वहन करने वाली जाति भयभीत है, उसे रोज मीडिया की रिपोटिंग में जलील किया जा रहा है कि उसने गंगा को प्रदूषित करने का अपराध किया, अपने परिजनों को सम्मानजनक विदाई नहीं दी आदि-आदि।
मीडिया के बंधुओं से सवाल है कि क्या सम्मान व्यक्त करने का तरीका निरपेक्ष हो सकता है? संस्कृति के साथ संदर्भ बदल जाते हैं पूरे देश का बाल बंगाल में जनांग के बाल हो जाते हैं, ऐसे में एकरूप वाली परिभाषा नहीं परोसें। निश्चित रूप से गंगा में शवों को प्रवाहित करने की घटनाओं में देश की सरकारों, प्रशासन की नाकामी का पोस्टमार्टम किया , आपकी रिर्पोटिंग ने प्रशासन के आंखों में शर्म का पानी भी लाने का काम किया लेकिन कृपया कर उन लोगों के परंपराओं का भी ख्याल रखें।
अंत में रिपोर्टरों के ब्रह्म ज्ञान का वाकया सुनाता हूं कि कैसे वे तथ्यों से सनसनी पैदा करते हैं, कुछ साल पहले बीएचयू में महिलाओं को लेकर आंदोलन चला और कुछ मीडिया के साथियों ने लिखा बीचयू में लड़कियों को छेड़ने के लिए बकायदा एक शब्द है ‘लंकेटिंग’ हम तो स्तब्ध रह गए कि आखिर दो साल हम तो वहां भुइंया ही रहे, इसका मतलब तो आजतक हम हॉस्टल से लंका जाने को ही समझ रहे थे।