गुरुवार, 24 मई 2012

हम उस देश के वासी हैं जहाँ क्रांति नहीं होती


पेट्रोल के दाम को सरकार ने बढ़ा दिया इससे लोग क्रोधित हैं। कुछ जगहों पर लोग प्रदर्शन कर रहे हैं,  पर कितने दिनों तक? शायद तीन दिन तीन सप्ताह या तीन महीने।  इसके बाद फिर हम निराश हताश होकर इस बढ़ोतरी को नियति मान कर अपने घरो में शांत बैठ जायेंगे। समस्या भी हमारी यही है, हम किसी काम को जोर शोर से शुरू तो करते है पर उसे किसी  मुकाम तक पहुंचाना हमारी फितरत नहीं। हमारे यहां पनपने वाला गुस्सा फ्रांस और रूस की तरह क्रांति का रूप नहीं ले पता है। नही तुर्की की तरह अमूल चूक परिवर्तन का रास्ता बना पता है। यही वजह है की देश में लोकतंत्र कहलाने वाली हुकूमते भी सामंतवादी सत्ता चलाने से बाज नहीं आती हैं।
यही वजह है की असली तारणहार नेता भी दीर्घकालिक परिवर्तन की बात करते है बजाय की व्यवस्था के ओवर हॉलिंग के। इतिहास में ऐसे तमाम उदहारण है। आज से करीब  ढाई हज़ार साल पहले बुद्ध की ही बात करें।  वह वैदिक धर्म के आडंबरो को खत्म करने के लिए निकले थे,बदलाव की अलख क्रांति के रूप जगाने का प्रयास किया पर उनके अनुयायियों ने ही बुद्ध में देवत्व स्थापित कर बदलाव की धारा को रोक दिया। यही हाल अशोक का भी रहा वह निकले तो थे बल के साथ पूरे जम्बूद्वीप पर कब्ज़ा करने के लिए, पर एक ही कलिंग युद्ध में उके इरादों को ऐसा झटका लगा की की वह क्रांति की तरह एक झटके में देश पर कब्ज़ा करने के इरादे को छोड़ कर धर्म की धीमी प्रक्रिया अपनाने के लिए मजबूर हो गए।
गांधी युग पर भी चर्चा कर लेते है एक विशेष विचारधारा का इतिहासकार गांधी जी को भारत की आज़ादी की लड़ाई का अग्रदूत मानते हैं। उनका कहना है की गांधी का देश की राजनीती पटल पर आना एक क्रांति है। अगर वास्तव में आज़ादी गाँधी और नेहरु से मिली तो फिर अफ्रीकी देशो को उसी दशक में आज़ादी कैसे मिली। दरअसल आज़ादी, भारत में हुई क्रांति नहीं बल्कि अंग्रेजो की कमजोरी का नतीजा है।  विषय से विष्यांतर नहीं होते और विषय पर आते है। अभी भी मेरा एक ही सवाल है की आखिर हमारे देश में क्रांति क्यों नहीं होती? एक और उदहारण ले ले  तो आजाद हिंद फौज को भी ले सकते है। जे पी आन्दोलन का हश्र देख लो। बहुत दूर कहा जा रहे है अन्ना को भी देख लें। उनके आन्दोलन की शुरुआत जिस उत्साह से शुरू हुई क्या उसी उत्साह से अपने मुकाम पर पहुंच पाया। जवाब मिलेगा नहीं। इससे साफ़ है की हम में क्रांति का बूता नहीं है  क्योंकि हम गुलामी हमारी मानसिकता में है।
यही कमजोरी देश की हुकूमत चला रही सरकार समझती है। वह जानती है की इस देश में क्रांति (क्रांति का अभिप्राय माओवादी रिवोल्यूशन से कतई नहीं है) का माद्दा नहीं कुछ घंटो की चिलम पो के बाद जनता तो खामोश हो ही जाएगी। ज्यादा से  ज्यादा लोक सभा में सत्तारूढ़ पार्टी को विपक्ष की सीट पर बै दिया जाएगा। लूटने का मौका तो तब भी मिलता ही रहेगा क्योंकि इस मामले में राजनीतिक बिरादरी में गजब की एकता है।
पर अब यह तस्वीर बदलनी चाहिए . अब क्रांति होनी चाहिए देश की जनता की  नाम पर  उन्हें ही चलने वालो को चौराहों पर खड़ा कर हिसाब मांगना चाहिए। 

रविवार, 20 मई 2012

आधिकारिक रूप से सठिया गई है संसद


13 मई को देश की संसद आधिकारिक रूप से सठिया गई। इस मौके पर सांसदों ने जश्न मनाया और हमें भी देश में लोकतंत्र की जड़ मजबूत हो रही है इस मुगालते के साथ उन खुशियों में शरीक होता हुआ दिखाया। पर वास्तव में संसद के साठ साल जश्न मनाने के लिए उपुक्त था? वह भी तब जब लोकतंत्र की दुहाई देने वाले सांसदों को आज से साठ साल पहले बनाए गई कार्टून का किताब में छापना नागवार गुजर रहा था। क्या यही लोकतंत्र की मजबूत जड़े हैं जहां अभिवयक्ति की स्वतंत्रता को खुद चुने हुए सांसद मर्दन करने के लिए उतारू हैं। कहते है लोकतंत्र में सांसद लोगों का प्रधिनित्व करता है, क्या हमारे सांसद को देख कर ऐसा कहा जा सकता है? निश्चित तौर पर नहीं।  हमारी सांसद और फ्रांस के बुर्जुआ वर्ग में कोई अंतर नहीं है। हमारे संसद में भी ठीक उसी तरह आम लोगो की रोटी को लूटने वालों पर खामोशी बरती जाती है, तो जनगारूक प्रतिनिधि का आपके हितों के लिए काम करने वाले संसद की छवि भ्रम से अधिक कुछ नहीं है।
वास्तव में यह दिन जश्न मानाने का नहीं मंथन करने का है। आखिर कैसे एक ओर गरीब जनता और  गरीब होती जा रही और सांसदों का बैंक बैलेंस बढ़ता जा रहा है? क्यों भ्रष्ट सांसदों को संसद विशेषाधिकार का कवच प्रदान करती है।  ऐसा नहीं है यह समस्या नया है। आजादी के महज दो साल के भीतर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के नाक के नीचे जीप घोटाला हो जाता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौर में यह कुप्रथा अपने चरम पर पहुंच जाती है और वह कौरव सभा की तरह भारतीयों की कमाई का द्रोपदी की तरह चीरण होने पर आंखे बंद कर देखते रह जाते हैं।
ऐसे में जनता को ठगने और कुछ मुट्ठी भर लोगों के हित साधक बन चुकी संसद की विश्वसनीयता का क्षीण होना आश्चर्यजनक नहीं है। इसलिए संसद को तय को अपने स्तर पर अग्निपरीक्षा देनी है। उसे साबित करना है कि उसके द्वारा बनाए गए कानून का पालन बाहर की जनता नहीं संसद के भीतर सांसदों को भी करना होता है और वे इसमें आदर्श हैं।


 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...