रविवार, 8 जनवरी 2012

भारतीयों की कमजोरी का सबूत लोकपाल का टलना

लोकपाल का हल्ला बोल आन्दोलन लगभग मृतप्राय हो गया है। नेता भी अब चैन की सांस ले रहे है। अन्ना भी मुंबई में भीड़ न जुटने से कुछ ज्यादा ही निराश हैं। ऊपर से शांतिभूषण पर कोर्ट का फरमान की वह जुर्माना भरे और इस बीच किरण बेदी पर लगते छोटे मोटे भ्रष्टाचार के आरोप। इससे कई लोगो का मानना है की अन्ना का जादू अब लोगो के सिर से उतर चूका है। वाशिंगटन पोस्ट अख़बार में वहां के रिपोर्टर ने भी इस आन्दोलन को लगभग कांतिहीन होता बताया है, तो क्या अब लोकपाल का सपना सपना ही रह जाएगा. क्या फिर से भारत की जनता को और चालीस साल ऐस कानून का इंतजार करना होगा। शायद हां क्योंकि अब हम अन्न को ठीक से नहीं सुनते अब हम में उबाल नहीं आता है। 
 यह हमारी सबसे बड़ी पुराणी बीमारी है हम किसी अच्छे मकसद के कोई काम तो शुरू करते हैं। लेकिन जल्द ही हार मान कर अपने घरो में बैठ जाते है। यही कारण है की नेता भी मामले को कुछ हवा देने के बाद टालने में कामयाब हो जाते है। हम किसी चीज को अंजाम तक नहीं पहुचाते है। उदहारण दूं तो शब्द कम पड़ जायेंगे। भारत की क्रिकेट टीम उसी का उदहारण पेश कर रही है।  हमने लोकपाल की लड़ाई तेज की और उसके बाद हम नेताओ की चाल में फंस गए । कोई मुस्लिम के लिए आरक्षण मांगने लगा तो कोई दलितों के लिए, कोई इसकी जरूरत पर ही प्रश्न चिन्ह लगाने लगा और हम शांत होकर सुनते रह गए।  कुछ इसी सोच की वजह से हमे अंग्रेजो से आज़ादी पाने के लिए 90 साल का लंबा संघर्ष करना पड़ा। इसलिए अब हमे सहनशीलता का झूठा चोला फेंक कर और नपुंसकता (केवल अक्रियाशीलता के संदर्भ में) छोड़ कर लोकपाल के लिए आंदोलन को मजबूत करना चाहिए। एक बात आपको भी पता है की क्रांति से तत्कालिक बदलाव होता है, लेकिन उसे स्थायी बनाने के लिए निरंतर जागरूक रहना पड़ता है। तो मेरी जनता और खास तौर से युवाओं से आह्वान है की वह सत्ता में अपनी ताकत दिखाए और देश हित में उन शक्तियो को उखाड़ फेंके चाहे संवेदनहीन स्थापित सत्ता केंद्र ही क्यों न बह जाए। क्योंकि मात्र 64 साल में ही हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था में सड़ांध आ गई है, जिसे बिना कड़वी दवा दिए ठीक नहीं किया जा सकता है और यह कड़ी दवा जन जागरूकता और तकनीक की तहकीकात से ही संभव है। 


शनिवार, 7 जनवरी 2012

कमरे में सिमटी जिंदगी

कभी हर काम के लिए कमरा होता था,
अब हर काम एक कमरे में होता है.
कभी चाहने वालो की भीड़ होती थी,
अब भीड़ में भी नहीं होता कोई चाहनेवाला .
कभी दोस्तों के झुण्ड में थे जी चुराते,
अब चाह कर भी नहीं जुटा पाते झुण्ड.
कभी अरमानो को पल भार में बयां कर देते थे,
अब उन्हें बयाँ करने का समय ही नहीं मिलता.
कभी आंसुओ के बिच में हंसी के फवारे छुट जाते,
अब हंसी के फवारो से ही गम छुपाते.
कभी तन्हाई में भी मिल जाता सहारा,
अब सहारा भी तन्हाई में मिलती है.
कभी हम गीत ख़ुशी का ही थे गाते,
अब गम को भी बताने के लिए जज्बात नहीं आते.

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