सोमवार, 24 मई 2021

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार 

कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाखों मौतों से इनकार  नहीं किया जा सकता। सरकारी दावों के विपरीत श्मशानों में अनगिनतत चिताओं  की धधकती आग और कब्रिस्तानों में दिन-रात खोदी जा रही कब्रें स्थिति की भयावहता को बेपर्दा करती है लेकिन जिस तरह से गंगा नदी और खासतौर पर प्रयागराज में गंगा नदी के किनारे शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग  गरीबी के तड़के के साथ की जा रही है वह सांस्कृतिक व्यभिचार से अधिक कुछ नहीं। 

मैं स्वयं  जीवन के 35 बसंतों में 25 बसंतों को गंगा-यमुना के दोआब में रहते हुए गुजरते देखा  है और यहां की माटी- संस्कृति से पूर्ण तो नहीं लेकिन काफी हद तक परिचित हूं। यह सवाल जायज हो सकते हैं कि हजारों मौतों को सरकार क्यों छिपा रही लेकिन उनके दफनाने पर सवाल और गरीबी का हवाला, केवल अज्ञानता या प्रोपगेंडा ही हो सकता है बल्कि यह भी ‘सांस्कृतिक ब्राह्मणवाद’ का प्रयाय है जिसमें एक ही परंपरा, मान्यता एवं विश्वास को श्रेष्ठ मानकर बाकी को हीन दृष्टि से देखा जाता है। 

प्रयागराज  की बात करें तो यहां कई जातियों में परंपरा रही है कि शवों को केवल पांच जगह पर उसकी संतान द्वारा दाग कर दफना दिया जाता है और यह कर्म अगर गंगा के किनारे हो तो सर्वोत्तम माना जाता है। निश्चित तौर पर इस परंपरा की पृष्ठभूमि को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं लेकिन उन जातियों की यह परिपाटी रही हैं। ऐसे में उनकी इस परंपरा को गरीबी से जोड़ हिकारत से देखना  उनकी संस्कृति से व्यभिचार नहीं है तो क्या है। 

प्रयागराज के फाफामऊ पुल के पास और श्रृंगश्वेर धाम पर गंगा के  किनारे शवों को दफनाने की परंपरा रही है और ये शव फतेहपुर, कौशांबी, प्रतापगढ और जौनपुर तक लाए जाते रहे हैं और करीब एक साल तक या जबतक गंगा उसे सपाट नहीं कर दे कब्रों पर चादर, फूल आदि चढ़ाने की परंपरा रही है।  ठीक वैसे ही जैसे काशी में प्राण त्यागने देश भर से लाेगे आते हैं और बिहार तक शवों को मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए लाए जाते रहे हैं। इऐ कथित आधुनिक सोच वाला धड़ा एक पुरापंथी  विचार वाला कर सकता है लेकिन क्या जो इनका अनुपालन करते हैं उन्हें अपनी सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने का हक नहीं है? 

आज मीडिया की रिपोर्टिंग की वजह से इस परंपरा का निर्वहन करने वाली जाति भयभीत है, उसे रोज मीडिया की रिपोटिंग में जलील किया जा रहा है कि उसने गंगा को प्रदूषित करने का अपराध किया, अपने परिजनों को सम्मानजनक विदाई नहीं दी आदि-आदि। 

मीडिया के बंधुओं से सवाल है कि क्या सम्मान व्यक्त करने का तरीका निरपेक्ष हो सकता है?  संस्कृति के साथ संदर्भ बदल जाते हैं पूरे देश का बाल बंगाल में जनांग के बाल हो जाते हैं, ऐसे में एकरूप वाली परिभाषा नहीं परोसें। निश्चित रूप से गंगा में शवों को प्रवाहित करने की घटनाओं में देश की सरकारों, प्रशासन की नाकामी का पोस्टमार्टम किया , आपकी रिर्पोटिंग ने प्रशासन के आंखों में शर्म का पानी भी लाने का काम किया लेकिन कृपया कर उन लोगों के परंपराओं का भी ख्याल रखें। 

अंत में रिपोर्टरों के ब्रह्म ज्ञान का वाकया सुनाता हूं कि कैसे वे तथ्यों से सनसनी पैदा करते हैं, कुछ साल पहले बीएचयू में महिलाओं को लेकर आंदोलन चला और कुछ मीडिया के साथियों ने लिखा बीचयू में लड़कियों को छेड़ने के लिए बकायदा एक शब्द है ‘लंकेटिंग’ हम तो स्तब्ध रह गए कि आखिर दो साल हम तो वहां भुइंया ही रहे, इसका मतलब तो आजतक हम हॉस्टल से लंका जाने को ही समझ रहे थे। 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

 भोजपुरी महज गुड्डु रंगीला नहीं है जनाब ....


बाजारवाद की वजह से घर-घर पहुंची भोजपुरी या बिहार में बोले जाने वाली अन्य भाषाओं की जो छवि आपने बनाई होगी वह ऐसा ही है जैसा बिहार की 1990 के दशक के कथित जंगल राज के बाद बनी, जो दो हजार के इतिहास का एक छटांक बराबर भी नहीं है। निश्चित रूप से भोजपुरी भाषा की यह छवि बनाने में हमारी भूमिका भी रही है।

वास्तव में भोजपुरी लोकगीत विशाल सागर है और जो आप कथित फूहड़ गीत को सुनते हैं वह एक अशं मात्र है जो लोक समाज में ‘डोमकच’ के नाम से जाना जाता है। यह विवाह में गई जाने वाली ‘गारी’ (गाली)होती है।
लड़के क शादी के दौरान पुरुषों के बारात में जाने के बाद अकेले रह गई महिलाओं के रात भर जगने एवं घर की रक्षा करने के साथ बिना किसी सामाजिक आडंबर, लोकलाज के पूर्ण रूप से मुक्त होकर स्वयं को प्रकट (यौन आकांक्षा सहित) करने मात्र का एक माध्यम था जो बंद दरवाजे में आंगन में ‘‘ डोमकच’’ के नाम से गाया जाात रहा है और इसे ही गैर भोजपुरी भाषी लोगों द्वारा भोजपुरी का प्रयाय मान लिया गया है जो वास्तविकता नहीं है।
भोजपुरी वास्तव में प्रगतिशील भाषा रही है जिस समय पश्मित्तोर भारत में भी बेमेल शादी शवाब पर था तब इसी भाषा ने ‘‘ बेटीबेचवा’ गीत के माध्यम से उस बेटी की भावनाओं को मंच दिया जोअपने से कहीं अधिक उम्र के पुरुष से विवाह करने की व्यथा को लोकलाज से दबाए रहती है, संभवत: इसी कुंठा को जब महिलाएं पुरुषवादी समाज से मुक्त होती है तो घर के आंगन में ‘डोमकच’ में व्यक्त करती थीं।
यह गीत के साथ नाटक होता है जिसमें बच्चे के जन्म से लेकर, पुलिस दरोगा, चोर, हाकिम, नौकर सभी बनने का स्वांग रचा जाता है।
भोजपुरी ‘डोमकच’ से कहीं अधिक है, यह काशी की रीति को आगे बढ़ाती है, मौत को भी नायिका बना ‘निर्गुण’ में व्यक्त करती है। यह वह भाषा है जो रोजगार के लिए मीलों दूर गए परिवार के सदस्य के अलग होने की व्यथा को ‘ बिरहा’ से व्यक्त करती है।
इस भाषा में गायन की विधा है जिसमें श्रृंगार, लास्य एवं तांडव की विधा तक व्यक्त करती है। यह भाषा रही जिसमें महिला की व्यवस्था को पुरुष द्वारा व्यक्त करने की मनाही नहीं रही न ही महिला को पुरुष के भाव को व्यक्त करने की।
वहीं, अंग्रेजी में बात-बात पर ‘फक्क यू’ को शालिनता मानने वाले ‘गाली’ की विधा को हिकारत से देखते हैं जबकि पूरे हिन्दुस्तान में यह आम परंपरा है कि शादी के दौरान स्वागत के रश्म में गाली दी जाती है, यह रिश्तों के जुड़ने एवं संबंधों की मधुरता का प्रतीक मात्र है। इसपर तर्क वितर्क हो सकता है लेकिन यह वैसा ही जब दोस्ती प्रगाढ़ होती है तो औपचारिकता की सीमा नहीं होती वैसे ही जब दो परिवार जुड़ते हैं तो गारी बस अंगीकार करने एवं प्रेम प्रकट करने का महज एक आदिम परंपरा हैं
भाेजुपरी, गुड्डु रंगीला, पवन सिंह, से आगे है, महेंद्र मिशिर द्वारा 100 साल पहले लिखे श्रृंगार गीतों की आज भी कोई सानी नहीं है‘ उदाहरण के लिए ‘अंगुरी में कटले बिया नगिनिया हे नंनदी’ पूर्विया गीत को उच्च मानक प्रदान करता है।
बिंधेश्वरी देवी के गीतों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है जिन्होंने अपने जीवनकाल में 10 हजार से अधिक गीतों को आवाज दी। भरत शर्मा के निर्गुण सहज रूप से आपके हृदय में मृत्यु वैराग्य उत्पन्न कर देते हैं।
शारदा सिन्हा की आवाज में भक्ति के छठ गीत तो दिल्ली से डेनवेयर हो या एडीलेड से अमेरिका जगह छह महापर्व पर जरूर सुनई देते हैं।
जब हम भोजपुरी गीतों की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि उपशास्त्रीय ठुमरी-कजरी की जननी भी यही भाषा हैं।
अत: अगली बार गुड्डु रंगीला या पवन सिंह के कथित गानों को सुन कर भोजपुरी की छवि बनाने से पहले भिखारी ठाकुर, बिंदेश्वरी देवी शारदा सिन्हा, भरत शर्मा, मदन राय को जरूर सुने।
अंत में एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि बाजार में छवि बनाने एवं बिगाड़ने का खेल अपने हित साधने के लिए होता है लेकिन वास्तुनिष्ठ वह होता है जो सपूर्णता में चीजों को देखता है। जिस तरह ‘चोली के पीछे’ हिंदी गानों का प्रयाय नहीं हो सकती, ‘सैटरडे नाइट वेन फी फाइट’ अंग्रेजी गीतों का प्रतिनिधित्व नहीं की सकती, उसी प्रकार चंद फूहड़ गीत तो एक वर्ग की यौन उत्कंठाओं को तृत्प करने के लिए बनाए जाते हैं वे पूरे एक भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती।

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

विज्ञापनों और फिल्मों का विरोध : असुरक्षा, एकपक्षीय तुष्टिकरण और बुद्धिजीवियों की विचारधारा की चाकरी का नतीजा

 देश के सबसे भरोसेमंद आभूषण ब्रांड टाटा के तनिष्क के  विज्ञापन पर बवाल मचा है और सोशल मीडिया पर ‘लव जिहाद ’ करार देकर बॉयकॉट करने की मुहिम चल रही है। हालांकि, इस तरह का विवाद नया नहीं है। ठीक इसी तरह का विवाद सर्फ एक्सेल द्वारा होली पर जारी एक विज्ञापन पर भी मचा था जिसमें नमाज पढ़ने जा रहे एक बच्चे को रंग लगाने की झलक थी। दरअसल भारत में कंपनियां लोगों का ध्यान आकर्षित कराने के लिए इस तरह का विज्ञापन लाती हैं , लेकिन समाज में एक धड़े में इनका जिस तरह से विरोध होता है उसपर सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है। क्यो ऐसी परिस्थिति बार-बार देश में आती है। 

मेरा मानना है कि इसकी जड़े असुरक्षा ,दूसरे पक्ष की तुष्टिकरण और बुद्धिजीवी वर्ग की केवल अपनी विचाराधार की चाकरी में है। राजनीतिक तुष्टिकरणभी उनमें एक है और इसकी जवाबी प्रतिक्रिया हमने वर्ष 2014 में देखी जब भारतीय राजनीति की धुरी ही अल्पसंख्यकवाद से हटकर बहुमतवाद पर चली आई। डॉ.मनमोहन सिंह के मुस्लिमों पर देश के संसाधनों के पहले अधिकार वाले बयान को भाजपा ने जितना भुनाया शायद किसी ने नहीं ,वह बहुमत  आबादी (कम से कम चुनावी वैतरणी पार कराने लायक संख्या)  को विश्वास दिलाने में कामयाब रही कि वह ही उसकी सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक विश्वास और परंपराओं की हितैषी है। यहीं वजह है कि गत छह सालों में बहुमत आबादी की ओर से ऐसे मामलों पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है जो पहले या तो दृष्टिगोचर नहींथी या फिर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नहीं होता था।

इन विरोधों को सोशल मीडिया ने धार दी है जो गाहे-बगाहे अपनी ताकत का मुजायरा करता है। यह हमने सुशांत सिंह राजपूत  की मौत के बाद आलिया भट्ट की फिल्म के प्रोमों के मामले में हमने देखा। अब बात करते हैं कि असुरक्षा की, तो वैश्चिकरण में हर समुदाय और धार्मिक समूह की बड़ी चिंता अपनी पहचान को बचाने को लेकर है। उसे लगता है कि उसने अपनी संस्कृति , भाषा और  परंपरा को अक्षुण्ण  नहीं रखा तो वह नष्ट हो जाएगी। इसी कड़ी में वह कोई बदलाव नहीं स्वीकार करता बल्कि और रूढीवादी हो जाता है। तनिष्क के विज्ञापन और सर्फ एक्सेल के विज्ञापन को इसी संदर्भ में देखा जाता है जब उसे लगता है कि उसकी संस्कृति और परंपरा पर दूसरे की श्रेष्ठता इन विज्ञापनों के जरिये स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। देश के बंटवारे का  इतिहास इस भय को अन्य मुल्कों के मुकाबले और बढ़ा देता है।  

दूसरी विरोध की वजह तुष्टिकरण है, गत 70 साल में हमारे राजनतिक वर्ग ने अपने -अपने लाभ के लिए किसी न किसी वर्ग का तुष्टिकरण किया। गलत बातों का विरोध नहीं किया। उदाहरण के लिए सलमान रुशदी के साथ सरकार खड़ी नहीं हुई क्योंकि उसे अपने वोट बैंक के खिसकने का डर लगा। वहीं, मौजूदा राजनीतिक वर्ग पद्मावती जैसी फिल्मों के विरोधियों के सामने अड़ नहीं सकी और पद्मावती किरदार के  लिबास  में जबरन बदलाव कराए गए। 

इस रुख ने लोगों को अपने ही हिसाब से चीजों को परिभाषित करने और उससे अगल होने पर सड़क पर तांडव मचाने का अधिकार  दे दिया। हालांकि, हमारे देश में विरोध की जो स्याह तस्वीर और राजनीतिक शह मौजूद है , वो शायद कहीं नहीं है।  

हालांकि, असुरक्षा के भाव को खत्म करने और तुष्टकरण के ऐब का विरोध करने की जिस बुद्धिजीवी वर्ग की जिम्मेदारी है वह हमारे देश में हमेशा से संदिग्ध रहा और यही वजह है कि उसकी विश्वसनीयता क्षीण होती रही । हमारे बुद्धिजीवी वर्ग ने अपनी विचारधारा की चाकरी करने को तरजीह दी, जैसे दक्षिण पंथी है तो इस विज्ञापन और ओ माइ गॉड जैसी फिल्मों का विरोध करेगा जबकि वामपंथी इसका समर्थन करेगा। वहीं द विंसी को और इनोसेंस ऑफ मुस्लिम का बहुमत से संबंध रखने वाला बुद्धिजीवी वर्ग दबी जुबान समर्थन करेगा लेकिन वामपंथी बुद्धिजीवी या तो चुप रहना मुनासिब समझेंगे या उनकी ही विचारधारा वाली सरकार द्वारा इन्हें प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद अभिव्यक्ति की आजादी की किताब बंद कर उल्टा समर्थन में तर्क देंगे। यही चाकरी देश को ऐसे मामलों में परिपक्व बनाने में सबसे बड़ी बाधा है।

ऐसे में आने वाले वर्षों में यह तस्वीर और स्याह ही देखने को मिलेगी क्योंकि इसका अंत होता नहीं दिख रहा है। हां, एक ऐसा भी वर्ग उठ रहा है जो बुद्धिजीवी नहीं है लेकिन वह मस्तमौला है। उसे इससे फर्क नहीं पड़ता की सर्फ एक्सेल से नमाजी के कुर्ते पर लगे होली रंग के दाग साफ होते हैं या मुस्लिम परिवार में हिंदू बहू की गोद भराई होती है  और यही वर्ग वास्तव में सोशल मीडिया हो या अन्य जगह मोर्चा ले रहा है और इनसे ही कुछ उम्मीद बनती है।  




 

सोमवार, 1 मई 2017

वामपंथ की चुनौती पूंजीवाद नहीं बल्कि कथनी करनी का अंतर

दुनियाभर में अमीर और गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। मजदूरों का शोषण बढ़ रहा है। इसके बावजूद आश्चर्यजनक रूप से सर्वहारा, मजलूमों, गरीबों की उम्मीद के तौर पर उभरी वामपंथी आंदोलन की धार कमजोर पड़ी है। भले वामपंथी साथी स्वीकार न करें, लेकिन वास्तविकता यह है कि उन्हें जितना नुकसान विरोधी पूंजीवादी व्यवस्था ने नहीं पहुंचाया, उससे कहीं अधिक आंदोलन का नेतृत्व करने वालों ने इसकी धार कुंद की।
कोई भी विचारधारा आदर्श रूप में चाहे जितनी आकर्षक क्यों न हो, उसका मूल्यांकन जमीनी क्रियान्वयन पर ही होता है और इस मामले में वामपंथी के लेनीनवादी,स्टालिनवादी, माओवादी और किम जोंग वादी संस्करण असफल हुए हैं। उन्होंने किसानों, मजूदरों और श्रमिकों को सबल करने के आदर्श स्वरूप जब जमीं पर उतारे तो उन्होंने पुरानी व्यवस्था के मुकाबले इस वर्ग को अधिक भयभीत किया। साम्यवाद के विभिन्न संस्करणों ने सैद्धांतिक रूप से राज्य को निमित मात्र मानने के बावजूद इस संस्था को इतना शक्तिशाली बना दिया कि वह अधिनायकवादी स्वरूप में आ गया।
शोषण की कुंजी के रूप में कुख्यात राजतंत्र का राष्ट्रवाद कम्युन की अधिनायकवाद के समक्ष बौना साबित हुआ। फर्क बस इतना पड़ा कि राजतंत्र ने जहां राष्ट्र के नाम पर उनकी हड्डियों का चूरा बनाया,वहीं कम्यून में सर्वहारा कल्याण के नाम। कम्युन में विरोध करने के लिए राजतंत्र द्वारा विकसित यातना के क्रूर तरीकों को और परिष्कृत किया गया।
प्रथम विश्व युद्ध में जनसंहार के आरोप में जिस निकोलस द्वितीय को रूस की गद्दी से उतारा गया था, स्टालिन ने उसी अधिनायकवादी रूवरूप में नए सिरे से सर्वहारा का ही संहार किया। बस अंतर इतना था कि इसका खुलासा उसके पदच्युत होने के बाद हुआ।
 राज्य के राजतंत्र स्वरूप में एक राजा और उसके मंत्रियों की सत्ता और संसाधन पर नियंत्रण होता है और इसी परिपाटी को बदल संसाधनों को बांटने के वादे की वजह से सर्वहारा वर्ग साम्यवादी व्यवस्था के प्रति आकर्षित हुआ। लेकिन सत्ता के केंद्र पर पहुंचने के बाद सर्वहारा वर्ग की उम्मीदें टूटी है। बस शब्द बदल गए लेकिन सत्ता का मिजाज वही रहा।
अब राजा नहीं पोलित ब्यूरों के सदस्यों और सत्तारूढ़ दल के समर्थकों को पुराने विशेषाधिकार मिल गए और सर्वहारा फिर हार गया। कई मायनों में यह पूर्व की व्यवस्था से और क्रूर साबित हुई। पहले राजा को केवल हाड़तोड़ मेहनत का कर देना होता था, लेकिन अब किसान की फसल भी कम्यून हो गई। कर देने के बाद बची राशि जो निश्चित तौर पर पर्याप्त नहीं थी, पर उसका अधिकार था जिसे कम्यून ने छिन ली और संसाधन होने के बावजूद राशनिंग प्रणाली लागू कर दी गई, जो एक कृत्रिम व्यवस्था साबित हुई। यही वजह है कि केंद्रीकृत व्यवस्था के कमजोर होते ही यह धराशायी हो गई। यह फ्रांसीसी क्रांति की तरह यह चीर स्थायी नहीं हो सका।
इसके उलट पूंजीवादी व्यवस्था ने अपना चोला बदल लिया। जनकल्याण के कार्यों को आडंबर स्वरूप ही सही अंगीकार किया। उसने मार्क्स के मजदूर कल्याण के सिद्धांतों को भी अपने अनुरूप बनाकर स्वीकार करने में परहेज नहीं किया। यही वजह है कि दुनिया से लाल क्रांति किताबों में सिमटती चली गई और पूंजीवादी व्यवस्था नए चोले में एक बार फिर आच्छादित हो रहा है।
भारत जुदा नहीं 
सोवियत संघ में कम्युनिस्ट के सत्तारूढ़ होने की खबर से गुलाम भारत भी अछूता नहीं रहा और 1924 में संस्थागत स्वरूप में स्थापित हुआ। लेकिन देश की बड़ी आबादी दबी-कुचली होने के बावजूद इसका प्रभावक्षेत्र सिमटता जा रहा है। इसकी एकमात्र वजह कथनी और करनी में अंतर,विकल्प का खाका दिए बिना केवल तकरार को बढ़ावा देना है।
दुनिया में लोकतांत्रिक रूप से पहली बार वामपंथी सरकार भारत के केरल राज्य में चुनी गई और इसमें कोई दो राय नहीं कि इस सरकार को कांग्रेस ने अस्थिर करने की कोशिश की। बवाजूद इसके बंगाल का किला भी लाल हो गया। केरल के मुकाबले बंगाल की उम्मीदें अधिक थी, क्योंकि ब्रिटिश राज और सामंतवादी व्यवस्था के कॉकटेल से था। शायद यही वजह रही कि प्रत्यक्ष रूप से उग्र वामपंथी आंदोलन की आग नक्सलबाड़ी में लगी। लेकिन आंदोलन के मात्र एक दशक के भीतर बंगाल पर वामपंथी सरकार के आगमन और तीन दशक के बाद भी लोगों का आकांक्षाओं का पूरा होना तो दूर मौलिक जरूरतें भी पूरी नहीं हुई। महत्वकांक्षाओं का केंद्र रहा कोलकाता भी धराशायी हो गया।  वामपंथी सरकार पूंजीवादी व्यवस्था की ओर से खिंची गई रेखा के सामने बड़ी रेखा खिंचने की बजाय उस रेखा को अपनी छोटी रेखा से कमतर करने के लिए कृतसंकल्पित दिखी। उत्कृष्ठ संस्थाओं का बड़े पैमाने पर पतन हुआ। कभी बिहार, पूर्वांचल और संपूर्ण भारत के सपनों के शहर रहे कोलकाता को हड़तालों, गंदगी और धरने-प्रदर्शनों के केंद्र में तब्दील कर दिया गया। संसाधनों में समानता के एजेंडे को पूरा करने के लिए जरूरी है कि संसाधन आए, लेकिन वामपंथी सरकार की नीतियों ने संसाधन के सृजन को ही रोक दिया और करीब तीन दशक बाद लोगों ने समझा कि आदर्श के फूल व्यवहार में सुगंध फैलाए यह जरूरी नहीं। यही कारण है कि 2011 में 32 साल का वाम किला धूरधूसित हुआ।
भारत में वामपंथी दलों की समस्या विचारों पर बंदिश भी है। जिस तरह से प्लूटो मानतें थे कि केवल शासक वर्ग को ही फैसले लेने का हक होना चाहिए। उसी प्रकार वामपंथी दल मानते हैं कि पोलित ब्यूरो ही बुद्धिजीवी हैं और उनके विरोधी आवाजों का महत्व नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो 2016 में जगमति सगवान को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता।







रविवार, 30 अप्रैल 2017

माओवाद : सुनहरी तस्वीर की स्याह हकीकत

माओवाद : सुनहरी तस्वीर की स्याह हकीकत
देश में करीब पांच दशक से जारी नक्सली हिंसा को जायज ठहराने के लिए वर्षों से तरह-तरह के तर्क गढ़े जा रहे हैं। हाल में सुकमा में सीआरपीएफ जवानों की हत्या के बाद इन कुतर्कों की धार तेज हो गई।  चूंकि माओवाद पड़ोस से आयातित विचारधार है, ऐसे में इसका विश्लेषण  इसके जन्म स्थान से ही किया जा सकता है।
नक्सली हिंसा का समर्थन कर रहे लोगों का तर्क है कि चूंकि आदिवासियों को जंगलों में धकेल दिया गया है और वहां पर भी सदियों के अधिकार छीन लिए गए हैं। इसलिए स्थानीय लोगों को व्यवस्था के खिलाफ जायज है और यही माओ की सीख है। लेकिन शायद वे भूल जाते हैं कि जब लोग व्यवस्था के खिलाफ दूसरे देशों या विरोधी शक्तियों के मोहरे बन जाते हैं, तो उनका सफाया उसी कड़ाई से किया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो नक्सलियों के वैचारिक पिता माओ जेडांग शांतिपूर्ण बिना हथियार के लोकतंत्र की मांग करने वालों को मांचूरियां के बियाबान में छोड़ने का आदेश नहीं देते या फिर अपनी अदालत अपनी व्यवस्था के तहत मौत की घाट नहीं उतरते। बाद में उसके उत्तराधिकारी शांति से तियेमिन चौक पर खड़े छात्रों पर टैंकों के गोले नहीं दगवाते। यह स्याह इतिहास कई माओवादियों को नहीं पचेगी और वे पूंजीपति व्यवस्था का प्रोपगेंडा करार नकार देंगे। इसमें कोई आश्यर्च नहीं।
वास्तविकता यह है कि माओ के वैचारिक संताने जब सत्ता से दूर रहती हैं तो मौजूदा व्यवस्था की ‘सड़ांध’से मुक्ति दिलाने के दावे करती है और क्रांति की राह चल सर्वहारा सत्ता की सुनहरी तस्वीर पेश करती है। ध्यान रहे केवल तस्वीर, उसको जमीन पर उतारने की कार्ययोजना नहीं। लेकिन एक बार सत्ता के शीर्ष पर पहुंचते ही राज्य की दोहरे ताकत से वही व्यवस्था लागू करती है, जो पहले से जारी थी, लेकिन और भी क्रूर और संवेदनहीन तरीके से।
माओ ने सत्ता संभालने के बाद नीति के तौर पर उन इलाकों की डेमोग्राफी बदली जहां उन्हें लगता था कि उनकी विचारधारा के विपरीत लोग हैं। जिनजियांग और तिब्बत इसके उदाहरण है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशियों की बसावट बढ़ाई गई।
माओवाद की विचारधार में मौलिक खामी राज्य की ओर से स्थापित कृत्रिम व्यवस्था है, जो कुछ दिनों तक तो चल सकती है, लेकिन स्थायी नहीं होती।  रूस, कंबोडिया, पूर्वी यूरोप और लातिन अमेरिकी में कम्युन का हश्र सर्वविदित है।
भारत में माओवाद और जनसमर्थन
भारत में हो रहे नक्सली हमलों को जनक्रांति कहते हुए नहीं अघाने वाले लोग यह नहीं बताते कि इस क्रांति में सत्ता के प्रतीक सैनिकों की हत्या से अधिक जनता क्यों मारी जा रही है। अगर वास्तव में जनक्रांति को लोगों का प्रबल समर्थन मिल रहा है, तो सरकार के मुखबिर के आरोप भर से जन अदालत लगा उसी जनता की हत्या क्यों की जा रही। सर्वहारा बहुमत में है और जनक्रांति करने को आतुर है, तो सड़क, टेलीफोन टावर और स्कूलों से नक्सलियों को भय क्यों लगता है। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम विवादित रहा, लेकिन उसने साबित कर दिया कि जिस तरह तरह से सरकार की नाकामी से नाराज एक वर्ग अज्ञात हित साधकों के आधुनिक बंदूक थाम रहा है, तो वहीं पर एक बड़ा धड़ा भी है कि इस नाकाम सरकार से अधिक उन रॉबिनहुड स्टाइल जनक्रांतिकारी माओवादियों से भी कहीं अधिक परेशान है और इसलिए वह उनके खिलाफ हथियार तक उठाने को तैयार है। वास्तविकता यह है कि यह कोई आंदोलन नहीं,बल्कि कुछ लोगों का एडवेंचर है, जो विदेशी, लेवी के पैसों से क्रांति का दंभ भर रहे हैं। यह वहीं विचार धारा है जो 1962 में कह रही थी कि हमें मुक्त कराने लाल सेना आ रही है।
निश्चित तौर पर समस्या
निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ यह देश के अन्य हिस्सों में प्रशासनिक अक्षमता है और सरकार लोगों की महत्वकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही है। लेकिन इसका विकल्प माओवादी स्टाइल की क्रांति नहीं है। इस क्रांति के चक्कर में जनता दोहरे चाक में पीस रही है। गांववालों को नक्सली धमकाते हैं वहीं प्रशासन की भी टेढ़ी नजर रहती है। दूसरी हर समस्या का हल बंदूक की नोंक पर नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता तो हमारे शहरों के गरीब आबादी वाले इलाकों के रहवासियों को भी बंदूक उठा लेनी चाहिए और बीजिंग, शंघाई जैसे शहरों में स्लम नाम की चीज नहीं होनी चाहिए क्योंकि वहां की सत्ता सर्वहारा के हितकारी एवं माओ के उत्तराधिकारियों के पास है। इसलिए समस्या को संवाद से ही सुलझाया जा सकता है।




बुधवार, 30 जुलाई 2014

मध्ययुगीन सोच के साथ पश्चिम एशिया में शांति नहीं

पश्चिम एशिया में जो हालात हैं। उससे साफ है कि गाजा में जारी संघर्ष हो या फिर सीरिया, इराक और लीबिया में कत्लेआम का दौर इसके पीछे असली वजह मध्ययुगीन सोच है, जिसमें तलवार के बल पर जमीं और जोरु पर कब्जे की चाहत होती है। भले ही अरब जगत इस फसाद के लिए इजरायली आक्रमण और अमेरिकी साजिश को जिम्मेदार ठहराएं, लेकिन उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि धर्म के नाम पर इसको खाद वे ही दे रहे हैं। 
पश्चिम एशिया ऐसा क्षेत्र हैं जहां सत्ता के शीर्ष पर सह अस्तित्व के सिद्धांत को खारिज किया गया है। चाहे सऊदी अरब में शियाओं और गैर मुस्लिमों का सवाल हो या फिर ईरान में सुन्नियों के साथ दोयम दर्जे का नागरिक व्यवहार। अरब जगत गाजा को लेकर जितना एक दिख रहा है क्या उसे अन्य धर्मों के मानने वालों पर होने वाली हिंसा के खिलाफ उतना मुखर नहीं होना चाहिए। गत दो सालों में मिस्र के कॉप्टिक ईसाईयों और इराक में सीरियन ईसाईयों के साथ जो हुआ क्या इसका विरोध मुखर तरीके से नहीं किया जाना चाहिए था। 
इसकी बड़ी वजह है कि पश्चिम एशिया में भारत , यूरोप और अमेरिका जैसे देशों की तर्ज पर सह अस्तित्व के सिद्धांत को शायद कभी नहीं स्वीकार किया गया। अमेरिका पर पश्चिमी एशिया सहित अन्य देशों में इस्लामी कट्टरपंथियों को बढ़ावा देने का आरोप लगता है। लेकिन क्या इस सच से मुंह मोड़ा जा सकता है कि यूरोप और पश्चिमी देशों में लोकतंत्र है और मुस्लिम सहित सभी धर्मों के लोग मोटे तौर पर अपने धर्म का अनुपालन करते हैं। अमेरिका की मस्जिदों में भी उसी शान से अजान के लिए मीनारे खड़ी की जाती हैं, जैसा कि अरब जगत में। लेकिन यह स्वतंत्रता सऊदी अरब जैसे देशों में नदारद है। 
आतंकवाद का मजहब नहीं होता, इसे धर्म से जोड़ना समझदारी नहीं , लेकिन क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में इस्लाम के नाम पर फसाद फैलाए गए। इसे प्रोपेगेंडा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया में अन्य धर्मो के अपमान होने पर भी विरोध प्रदर्शन होते हैं, हिंसा भी होती है। लेकिन वर्ष 2011 में ‘इनोसेंश ऑफ मुस्लिम’ फिल्म को लेकर जिस प्रकार से हिंसक प्रदर्शन हुए और सैकड़ों की मौत हुई वह मध्ययुगीन मानसिकता और असहिष्णुता का प्रतीक नहीं है तो क्या है? इसका अभिप्राय कतई नहीं है कि ऐसे बेहूदेपन का समर्थन किया जाए, लेकिन क्या इसके जवाब में दी गई प्रतिक्रिया उससे ज्यादा अमानवीय और वहशीपना लिए हुए नहीं थी?
इस बात से कोई इनकार नहीं कि धर्म में समय के साथ कुछ रूढ़िया भी आती हैं जिन्हें निरंतर दूर करने की कोशिश की जाती रहनी चाहिए। इसका विरोध भी होगा लेकिन पश्चिम एशिया में इन कोशिशों को संगीनों के सहारे उन्हें दबाने की आतुरता अधिक दिखाई देती है। हिंदू धर्म में भी जब बहुविवाह और सती प्रथा पर रोक लगाई गई, तो कट्टरपंथियों ने खूब हो हल्ला मचाया। ईसाई धर्म में भी डायन कहकर महिलाओं को बर्बर तरीके से जलाने की घटनाएं इतिहास में दफन है। लेकिन इन धर्मों ने इसमें सुधार करने की पहल की। लाख ना नुकुर करने के बाद आखिरकार कैथोलिक चर्च ने माना कि उसके गिरिजाघरों में बच्चों के यौन शोषण हुए हैं। पश्चिम में भी श्वेत गौरवर्ण के गुरुर में थे, लेकिन अब उनकी वह पैठ नहीं रही जो 19वीं शताब्दी  में थी। भारत के हिंदू समाज में भी जातियों के जकड़न में पूरा समाज कैद था, लेकिन उससे मुक्त होने की कोशिश हो रही है। 
इसी तरह का प्रयास पश्चिम एशिया में करना होगा और वह भी सत्ता के शीर्ष स्तर पर। आखिर कब तक अरब जगत इस्लाम के तैमूर संस्करण को ढोता रहेगा। जहां तलवार के बल पर धर्म प्रचार की आतुरता दिखती है। संस्कृति की परिभाषा को लेकर संदर्भ अलग-अलग हो सकते हैं। पश्चिम के खुलेपन को इस्लामी जगत नहीं अपना सकता है और अपनाना भी नहीं चाहिए। लेकिन क्या जिस धर्म में लड़की की इजाजत के बिना शादी की मनाही है वहां जबरन शादियों या पैसे देकर शादियों पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। इस्लामी जगत में अपराधियों को दी जाने वाली सजा और मानवीय नहीं बनाई जा सकती है। निश्चित तौर पर इस मामले में ईरान की प्रशंसा करनी चाहिए कि उसने कुछ हद तक इस ओर पहल की है और यहां पर महिलाओं की स्थिति सऊदी अरब की महिलाओं जैसी नहीं है। मध्यकाल में युद्ध होते थे और उस समय जीत की वस्तु के रूप में महिलाओं को देखा जाता था। इसलिए पर्दे से लेकर पुरुष साथी के साथ ही घर से बाहर जाने की बंदिश थी। क्या इन देशों में अब बदले हालात में महिलाओं के लिए उसी तरह की बंदिश की जरूरत है क्या इसपर चर्चा नहीं होनी चाहिए?
 आखिर वक्त के साथ जब हम तलवार की जगह मिसाइल को अपना सकते हैं, हवाई जहाज से उड़ सकते हैं, तो फिर इन कट्टर सोच के पैमानों में सुधारों की कोशिश क्यों नहीं? 








शनिवार, 31 अगस्त 2013

झब्बार चच्चा तुसी ग्रेट हो

झब्बार चच्चा तुसी ग्रेट हो
झब्बार चाचा की चाची के साथ की गई मेहनत से ऊपर वाला खासा प्रसन्न था। इसलिए उन्हें चार नेमते दीं। झब्बार चच्चा ने इन्ही नेमतों में से एक को देश की सेवा में लगा दिया। उनका बेटा दुबई गया और वहां से आईएसआई की सरपरस्ती में देश सेवा के गुर सिखने लगा। उसे लगा कि देश में रोजाना अब्बा की तरह हजारों, लाखों की संख्या में नेमते आती हैं। इसलिए इनमें कमी लाकर देश की सेवा की जा सकती है। सो वह इस काम में लग गया। झब्बार चच्चा को भी इसका इल्म था। लेकिन वह कुछ कहते नहीं थे, कहा भी होगा तो मीडिया ने नहीं छापा और हमने नहीं सुना।
चच्चा इससे खासे नाराज थे। उनकी नाराजगी सरकार से भी थी। उनका कहना था कि उन्होंने अपने नेमतों में से एक को देश की सेवा के लिए दान दे दिया। बदले में सरकार ने क्या दिया। उस देश सेवा में लगाए नेमत जो अब फरिश्ता बन चुका था से मिलाने के लिए सरकार कभी पांच लाख, कभी दस लाख रुपये देने की घोषणा कर देती। पूरा जोड़ने पर एक करोड़ नहीं होता, इतना तो उनका नेमत विदेश से ही भेज देता है।
चच्चा का कहना है कि अब उनमें इतनी ताकत नहीं रही कि वह अपने नेमत को देश सेवा के रास्ते से डिगा कर वापस ला दें और उनके शरीर के कुछ अंगों की वह हालत नहीं रही जिसकी मदद से वह ऊपर वाले से एक आध नेमत चुरा लाएं।
खैर देश सेवा के काम में उन्होंने जिस नेमत को लगाया था , वह बखूबी अपना काम कर रहा था। पर झब्बार चच्चा की मानें तो उन्हें वह कुछ भी नहीं बता रहा था। लेकिन उन्हें भरोसा है कि उनकी नेमत गलत नहीं हो सकती है। इसलिए उनकी मांग है कि इस सेवा के लिए उनके बाकी नेमतों को सरकार नौकरी दे। कुछ पैसे दे ताकि वह भी कम से कम एक आध दर्जन और नेमत इस जहां में ला सके और देश सेवा की इस परंपरा को आगे बढ़ा सके।

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...