गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

किस पर करू भरोसा

किस पर करू भरोसा, यहाँ विभीषण हैं बैठे
या कहू उस स्तर से भी निचे गिरे हुए हैं
विभीषण ने तो रावन को सही रा दिखाया था
यहां तो सब राह पर कांटे बिछाने के लिए हैं
मै हूँ तन्हा पहचान नहीं है कौन है खंजर धारी
अगर जान भी गया तो क्या
मैं अस्त्रहीन, दंतहीन उनका नहीं कर सकता सामना
बस अब मुझे नहीं भरोसा मानवता ,
नहीं उस संस्कार पर, जिसे माँ ने सिखाया
कहा, बेटा सदा देना सच का साथ
यहाँ तो सच ही हो गया है पाप
बस आस है की मै निकल आऊं इन कंदराओं से
आस्तीन के सांपों से
पर है मुश्किल ,
किस पर करू भरोसा
ऐतबार नहीं मुझे खुद पे 

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