सोमवार, 30 नवंबर 2009
मुझसे मेरी यादे न छिनो
दरिया के साहिल को दिल में सीता ,
बस आरजू है की इन यादो को समेटू,
पर कम्बखत इस ज़माने को यह भी नही मंज़ूर,
यादो की कसती के सहारे मै जिउ अपनों को भी यह नही काबुल,
सोचता हूँ आँखों के कगार को न तोडू,
ज़माने के गम को हंस के छोडू,
महफिल के रौनक में दिखा दू कि हँसता हूँ ,
अस्को पर फब्ती कसता हूँ ,
पर क्या दोहरी जज्बात ऐ इज़हार मुनासिफ होगा?
अपने अरमानो को छिपा जीना मुमकिन होगा?
कुचे ये सवाल है जिनका जवाब मुस्किल होगा,
पर राही मै ने इसे भी पार लिया है,
एक जवाब तयार किया है ,
मेरे यादो को मत छीनो ,
मेरी दुनिया में मुझे जीने दो.
गुरुवार, 12 नवंबर 2009
एक रात
तभी एक आवाज़ आई , आवाज़ थी पहचानी ,
हिरदय से जानी, भला इसे कोई भूलता है ,
माँ से कोई भिनता है ,
पर विधाता को भी कुछ भाता है ,
झट से नींद छुटी , सपने की भी डोर टूटी ,
आँखों को मलता हूँ , आस पास झोलता हूँ ,
पर सब अँधेरा है , सवपन महल अकेला है ,
उठ कर झटकता हूँ ,आंखे मल ढूढता हूँ ,
सुबह की लालिमा छाई , जग में है खुसिया आई,
पर मेरे मन में अँधेरा ने दे दी थी दस्तक ,
आख़िर माँ हो गयी थी रुखसत ,
अपने पर हँसता , अपने पर रोता हूँ ,
बिधाता को कई - कई बार कोसता हूँ ,
मैं ही था निरीह प्राणी जो तुने छिना रानी,
बीत गए साल साल पर दर्द है अज ,
फिर मैं सोचता हूँ , दिन को कोसता हूँ ,
खुस मैं होता हूँ रात जब आती है सपनो में ही सही लोरी तो सुनती है ,
चरणों का अब सुख नही , अंचलो की छाओ नही ,
अभागे जीवन में माँ का लगाओ नही ,
दर्द की दोपहरी अकेले सहा जाता हूँ , सपनो की आस में रात में जिए जाता हूँ ।
मुझे तो सबने छला ही
एक रात बैठी थी प्रीतम की याद में ,
प्रीतम आयगा स्वप्न महल सजएगा,
हूँगी मैं प्रफुलित प्रीतम के बांहों में,
मैं भी प्रीतम को कजरे की डोर से बंधने की आस में,
सारी रात जगती रही ,खुले आँखों से पलकों के पंख को झलती रही,
है तभी तूफ़ान आया , प्रीतम को मन न भाया ,
वोह कही दूर चला , स्वप्न महल भूल चला,
नही सुनी प्रियतमा की भी पुकार ,प्रीतम की याद में वोह करती रही चीत्कार
आँखों का नींद टूटा, अरमानो का घर लूटा ,
सुबह की किरण फूटी, दिल की आह छुटी ,
आँखों के कगार टूटे , तब मैंने यही सोचा ,
पहली बार तो हुआ नही , सावन ऐसे ही छुआ नही,
प्रियतमा की तो पुराणी कहानी , बिरह में जलना है रवानी,
दुष्यंत भी तो प्रियतमा को छोड़ चला था, अपनी आंखे मोड़ चला था,
शकुन्तला रोअती रही रात रात भर , प्रीतम की आस में ,
प्रीतम ठहरा कठोर शिला , कहा पिघलने वाला था ,
सकुन्तला को दर्द अकेले सहे जाना था , अंत में प्रियतमा के अश्रु से बात निकली ,
कुंठित मन से दुःख संगीत की तान निकली, भराई अश्रु से बस दो शब्द निकले ,
प्रियतमा की तो यही कहानी, सब्से छले जाने पर भी आस न छोडो ,
नित यही आस से जियो छलिया प्रीतम आयेगा , बाहों का हार पहनायेगा ,
तब मैं आस पुराऊंगी , फिर से एक बार सधवा कह्लावूंगी ,
नित यही आस है जो नही होती पुराणी , प्रीतम की याद मई यू ही सजाती हूँ ,
छलिया को छलने पर भी खुशी धून हूँ गाती .
बुधवार, 11 नवंबर 2009
एक नीड़ टूट गया
अरमान से एक -एक तिनका जोड़ा ,हिरदय के कोटर में महल को समेटा ,
सोचा था की मै रहूँगा ,खुशियो को मै सहूँगा,

तभी एक तूफ़ान आया ,मन फूटा ,घर टूटा,
सायद यह जग छूटा ,एक द्य्त्य ने घर पर हमला किया
घर की मालकिन हुई घयेल , घायल हो कर भी मुझे संभाला ,
पर बिधाता को यह भी देखा न गया ,उसे भी छीन लिया,
घटना हुई सात साल पुरानी, पर लगती कल की ,
भला नीद का टूटना ,स्वप्न महल का छूटना भी भूलता है,
बस यद् करता , पर होता है आँखों के कगार बस टूट जाते है,
जब नीद टूट जाते है ,स्वप्न महल छूट जाते है ।
सुनहरा नीड़ टूट जाता है, आह बस रह जाता है,
और रह जाती है सिर्फ़ आंसू ।
चुनाव क्या लोकतंत्र को मजबूत करता है
मंगलवार, 10 नवंबर 2009
माँ होती ?
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