माओवाद : सुनहरी तस्वीर की स्याह हकीकत
देश में करीब पांच दशक से जारी नक्सली हिंसा को जायज ठहराने के लिए वर्षों से तरह-तरह के तर्क गढ़े जा रहे हैं। हाल में सुकमा में सीआरपीएफ जवानों की हत्या के बाद इन कुतर्कों की धार तेज हो गई। चूंकि माओवाद पड़ोस से आयातित विचारधार है, ऐसे में इसका विश्लेषण इसके जन्म स्थान से ही किया जा सकता है।
नक्सली हिंसा का समर्थन कर रहे लोगों का तर्क है कि चूंकि आदिवासियों को जंगलों में धकेल दिया गया है और वहां पर भी सदियों के अधिकार छीन लिए गए हैं। इसलिए स्थानीय लोगों को व्यवस्था के खिलाफ जायज है और यही माओ की सीख है। लेकिन शायद वे भूल जाते हैं कि जब लोग व्यवस्था के खिलाफ दूसरे देशों या विरोधी शक्तियों के मोहरे बन जाते हैं, तो उनका सफाया उसी कड़ाई से किया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो नक्सलियों के वैचारिक पिता माओ जेडांग शांतिपूर्ण बिना हथियार के लोकतंत्र की मांग करने वालों को मांचूरियां के बियाबान में छोड़ने का आदेश नहीं देते या फिर अपनी अदालत अपनी व्यवस्था के तहत मौत की घाट नहीं उतरते। बाद में उसके उत्तराधिकारी शांति से तियेमिन चौक पर खड़े छात्रों पर टैंकों के गोले नहीं दगवाते। यह स्याह इतिहास कई माओवादियों को नहीं पचेगी और वे पूंजीपति व्यवस्था का प्रोपगेंडा करार नकार देंगे। इसमें कोई आश्यर्च नहीं।
वास्तविकता यह है कि माओ के वैचारिक संताने जब सत्ता से दूर रहती हैं तो मौजूदा व्यवस्था की ‘सड़ांध’से मुक्ति दिलाने के दावे करती है और क्रांति की राह चल सर्वहारा सत्ता की सुनहरी तस्वीर पेश करती है। ध्यान रहे केवल तस्वीर, उसको जमीन पर उतारने की कार्ययोजना नहीं। लेकिन एक बार सत्ता के शीर्ष पर पहुंचते ही राज्य की दोहरे ताकत से वही व्यवस्था लागू करती है, जो पहले से जारी थी, लेकिन और भी क्रूर और संवेदनहीन तरीके से।
माओ ने सत्ता संभालने के बाद नीति के तौर पर उन इलाकों की डेमोग्राफी बदली जहां उन्हें लगता था कि उनकी विचारधारा के विपरीत लोग हैं। जिनजियांग और तिब्बत इसके उदाहरण है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशियों की बसावट बढ़ाई गई।
माओवाद की विचारधार में मौलिक खामी राज्य की ओर से स्थापित कृत्रिम व्यवस्था है, जो कुछ दिनों तक तो चल सकती है, लेकिन स्थायी नहीं होती। रूस, कंबोडिया, पूर्वी यूरोप और लातिन अमेरिकी में कम्युन का हश्र सर्वविदित है।
भारत में माओवाद और जनसमर्थन
भारत में हो रहे नक्सली हमलों को जनक्रांति कहते हुए नहीं अघाने वाले लोग यह नहीं बताते कि इस क्रांति में सत्ता के प्रतीक सैनिकों की हत्या से अधिक जनता क्यों मारी जा रही है। अगर वास्तव में जनक्रांति को लोगों का प्रबल समर्थन मिल रहा है, तो सरकार के मुखबिर के आरोप भर से जन अदालत लगा उसी जनता की हत्या क्यों की जा रही। सर्वहारा बहुमत में है और जनक्रांति करने को आतुर है, तो सड़क, टेलीफोन टावर और स्कूलों से नक्सलियों को भय क्यों लगता है। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम विवादित रहा, लेकिन उसने साबित कर दिया कि जिस तरह तरह से सरकार की नाकामी से नाराज एक वर्ग अज्ञात हित साधकों के आधुनिक बंदूक थाम रहा है, तो वहीं पर एक बड़ा धड़ा भी है कि इस नाकाम सरकार से अधिक उन रॉबिनहुड स्टाइल जनक्रांतिकारी माओवादियों से भी कहीं अधिक परेशान है और इसलिए वह उनके खिलाफ हथियार तक उठाने को तैयार है। वास्तविकता यह है कि यह कोई आंदोलन नहीं,बल्कि कुछ लोगों का एडवेंचर है, जो विदेशी, लेवी के पैसों से क्रांति का दंभ भर रहे हैं। यह वहीं विचार धारा है जो 1962 में कह रही थी कि हमें मुक्त कराने लाल सेना आ रही है।
निश्चित तौर पर समस्या
निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ यह देश के अन्य हिस्सों में प्रशासनिक अक्षमता है और सरकार लोगों की महत्वकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही है। लेकिन इसका विकल्प माओवादी स्टाइल की क्रांति नहीं है। इस क्रांति के चक्कर में जनता दोहरे चाक में पीस रही है। गांववालों को नक्सली धमकाते हैं वहीं प्रशासन की भी टेढ़ी नजर रहती है। दूसरी हर समस्या का हल बंदूक की नोंक पर नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता तो हमारे शहरों के गरीब आबादी वाले इलाकों के रहवासियों को भी बंदूक उठा लेनी चाहिए और बीजिंग, शंघाई जैसे शहरों में स्लम नाम की चीज नहीं होनी चाहिए क्योंकि वहां की सत्ता सर्वहारा के हितकारी एवं माओ के उत्तराधिकारियों के पास है। इसलिए समस्या को संवाद से ही सुलझाया जा सकता है।
देश में करीब पांच दशक से जारी नक्सली हिंसा को जायज ठहराने के लिए वर्षों से तरह-तरह के तर्क गढ़े जा रहे हैं। हाल में सुकमा में सीआरपीएफ जवानों की हत्या के बाद इन कुतर्कों की धार तेज हो गई। चूंकि माओवाद पड़ोस से आयातित विचारधार है, ऐसे में इसका विश्लेषण इसके जन्म स्थान से ही किया जा सकता है।
नक्सली हिंसा का समर्थन कर रहे लोगों का तर्क है कि चूंकि आदिवासियों को जंगलों में धकेल दिया गया है और वहां पर भी सदियों के अधिकार छीन लिए गए हैं। इसलिए स्थानीय लोगों को व्यवस्था के खिलाफ जायज है और यही माओ की सीख है। लेकिन शायद वे भूल जाते हैं कि जब लोग व्यवस्था के खिलाफ दूसरे देशों या विरोधी शक्तियों के मोहरे बन जाते हैं, तो उनका सफाया उसी कड़ाई से किया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो नक्सलियों के वैचारिक पिता माओ जेडांग शांतिपूर्ण बिना हथियार के लोकतंत्र की मांग करने वालों को मांचूरियां के बियाबान में छोड़ने का आदेश नहीं देते या फिर अपनी अदालत अपनी व्यवस्था के तहत मौत की घाट नहीं उतरते। बाद में उसके उत्तराधिकारी शांति से तियेमिन चौक पर खड़े छात्रों पर टैंकों के गोले नहीं दगवाते। यह स्याह इतिहास कई माओवादियों को नहीं पचेगी और वे पूंजीपति व्यवस्था का प्रोपगेंडा करार नकार देंगे। इसमें कोई आश्यर्च नहीं।
वास्तविकता यह है कि माओ के वैचारिक संताने जब सत्ता से दूर रहती हैं तो मौजूदा व्यवस्था की ‘सड़ांध’से मुक्ति दिलाने के दावे करती है और क्रांति की राह चल सर्वहारा सत्ता की सुनहरी तस्वीर पेश करती है। ध्यान रहे केवल तस्वीर, उसको जमीन पर उतारने की कार्ययोजना नहीं। लेकिन एक बार सत्ता के शीर्ष पर पहुंचते ही राज्य की दोहरे ताकत से वही व्यवस्था लागू करती है, जो पहले से जारी थी, लेकिन और भी क्रूर और संवेदनहीन तरीके से।
माओ ने सत्ता संभालने के बाद नीति के तौर पर उन इलाकों की डेमोग्राफी बदली जहां उन्हें लगता था कि उनकी विचारधारा के विपरीत लोग हैं। जिनजियांग और तिब्बत इसके उदाहरण है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशियों की बसावट बढ़ाई गई।
माओवाद की विचारधार में मौलिक खामी राज्य की ओर से स्थापित कृत्रिम व्यवस्था है, जो कुछ दिनों तक तो चल सकती है, लेकिन स्थायी नहीं होती। रूस, कंबोडिया, पूर्वी यूरोप और लातिन अमेरिकी में कम्युन का हश्र सर्वविदित है।
भारत में माओवाद और जनसमर्थन
भारत में हो रहे नक्सली हमलों को जनक्रांति कहते हुए नहीं अघाने वाले लोग यह नहीं बताते कि इस क्रांति में सत्ता के प्रतीक सैनिकों की हत्या से अधिक जनता क्यों मारी जा रही है। अगर वास्तव में जनक्रांति को लोगों का प्रबल समर्थन मिल रहा है, तो सरकार के मुखबिर के आरोप भर से जन अदालत लगा उसी जनता की हत्या क्यों की जा रही। सर्वहारा बहुमत में है और जनक्रांति करने को आतुर है, तो सड़क, टेलीफोन टावर और स्कूलों से नक्सलियों को भय क्यों लगता है। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम विवादित रहा, लेकिन उसने साबित कर दिया कि जिस तरह तरह से सरकार की नाकामी से नाराज एक वर्ग अज्ञात हित साधकों के आधुनिक बंदूक थाम रहा है, तो वहीं पर एक बड़ा धड़ा भी है कि इस नाकाम सरकार से अधिक उन रॉबिनहुड स्टाइल जनक्रांतिकारी माओवादियों से भी कहीं अधिक परेशान है और इसलिए वह उनके खिलाफ हथियार तक उठाने को तैयार है। वास्तविकता यह है कि यह कोई आंदोलन नहीं,बल्कि कुछ लोगों का एडवेंचर है, जो विदेशी, लेवी के पैसों से क्रांति का दंभ भर रहे हैं। यह वहीं विचार धारा है जो 1962 में कह रही थी कि हमें मुक्त कराने लाल सेना आ रही है।
निश्चित तौर पर समस्या
निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ यह देश के अन्य हिस्सों में प्रशासनिक अक्षमता है और सरकार लोगों की महत्वकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही है। लेकिन इसका विकल्प माओवादी स्टाइल की क्रांति नहीं है। इस क्रांति के चक्कर में जनता दोहरे चाक में पीस रही है। गांववालों को नक्सली धमकाते हैं वहीं प्रशासन की भी टेढ़ी नजर रहती है। दूसरी हर समस्या का हल बंदूक की नोंक पर नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता तो हमारे शहरों के गरीब आबादी वाले इलाकों के रहवासियों को भी बंदूक उठा लेनी चाहिए और बीजिंग, शंघाई जैसे शहरों में स्लम नाम की चीज नहीं होनी चाहिए क्योंकि वहां की सत्ता सर्वहारा के हितकारी एवं माओ के उत्तराधिकारियों के पास है। इसलिए समस्या को संवाद से ही सुलझाया जा सकता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें