शनिवार, 31 अगस्त 2013

झब्बार चच्चा तुसी ग्रेट हो

झब्बार चच्चा तुसी ग्रेट हो
झब्बार चाचा की चाची के साथ की गई मेहनत से ऊपर वाला खासा प्रसन्न था। इसलिए उन्हें चार नेमते दीं। झब्बार चच्चा ने इन्ही नेमतों में से एक को देश की सेवा में लगा दिया। उनका बेटा दुबई गया और वहां से आईएसआई की सरपरस्ती में देश सेवा के गुर सिखने लगा। उसे लगा कि देश में रोजाना अब्बा की तरह हजारों, लाखों की संख्या में नेमते आती हैं। इसलिए इनमें कमी लाकर देश की सेवा की जा सकती है। सो वह इस काम में लग गया। झब्बार चच्चा को भी इसका इल्म था। लेकिन वह कुछ कहते नहीं थे, कहा भी होगा तो मीडिया ने नहीं छापा और हमने नहीं सुना।
चच्चा इससे खासे नाराज थे। उनकी नाराजगी सरकार से भी थी। उनका कहना था कि उन्होंने अपने नेमतों में से एक को देश की सेवा के लिए दान दे दिया। बदले में सरकार ने क्या दिया। उस देश सेवा में लगाए नेमत जो अब फरिश्ता बन चुका था से मिलाने के लिए सरकार कभी पांच लाख, कभी दस लाख रुपये देने की घोषणा कर देती। पूरा जोड़ने पर एक करोड़ नहीं होता, इतना तो उनका नेमत विदेश से ही भेज देता है।
चच्चा का कहना है कि अब उनमें इतनी ताकत नहीं रही कि वह अपने नेमत को देश सेवा के रास्ते से डिगा कर वापस ला दें और उनके शरीर के कुछ अंगों की वह हालत नहीं रही जिसकी मदद से वह ऊपर वाले से एक आध नेमत चुरा लाएं।
खैर देश सेवा के काम में उन्होंने जिस नेमत को लगाया था , वह बखूबी अपना काम कर रहा था। पर झब्बार चच्चा की मानें तो उन्हें वह कुछ भी नहीं बता रहा था। लेकिन उन्हें भरोसा है कि उनकी नेमत गलत नहीं हो सकती है। इसलिए उनकी मांग है कि इस सेवा के लिए उनके बाकी नेमतों को सरकार नौकरी दे। कुछ पैसे दे ताकि वह भी कम से कम एक आध दर्जन और नेमत इस जहां में ला सके और देश सेवा की इस परंपरा को आगे बढ़ा सके।

चटकल जी पधारो मारा देश

हमारी सरकार ने भले ही ईमानदारी और लोकपरोपकार की परंपरा को भुला दिया हो। पर मेहमाननवाजी की परंपरा का वह आज भी बड़े ही शिद्दत से पालन करती है। हमारे दुश्मन पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी भी इसके कायल हैं। उन्हें आज भी खुर्शीद साहब का दिया हुआ वह बिरयानी पार्टी याद है जिसे सीमा पर सैनिकों के सिर कटने के बावजूद दिया गया था।
 खैर आज हम इन मिसालों को याद नहीं करेंगे। वह भी तब जब हमारे यहां पर दो नए मेहमान पधारे हैं। बुधवार को मुएं सरकारी अधिकारी नेपाल की हसीन घाटियों में छुट्टियां बिता रहे चटकलजी और गड्डीजी को मेहमान बनाकर ले आएं। (कृपया इन्हें जी कहने पर कोई आपत्ति न करे क्योंकि हमारे मंत्री जी ने ऑन रिकॉर्ड संसद में ओसामा जी कहकर इस परंपरा की शुरुआत की है। हमारे यहां एक पार्टी के प्रवक्ता तो ओसामा जी को शांति का नोबेल दिलवाने के लिए पैरवी कर रहे हैं। लेकिन मुंआ अमेरिका है जो टांग अड़ा देता है। खैर आज इसकी भी चर्चा करने का समय नहीं है। यह अख्यान फिर कभी)
तो हम बात कर रहे थे चटकलजी के बारे में। भारत सरकार कब से उनकी मेहमान नवाजी करने को आतुर थी। उन्हें घर बुलाने के लिए कई बार प्रयास किए। इसी सिलसिले में अपने कुछ मुलाजिमों को आमंत्रण पत्र के साथ नेपाल भेजा। आमंत्रण पर अमल करते हुए मुलाजिम उन्हें ले आए। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं। बिहार के रास्ते देश में लाते है ही मुलाजिमों ने सरकार को चटकलजी के आने की सूचना सरकार को दी कि मेहमान पधार चुके हैं।
सरकार ने सूचना पाकर मेहमानों से कुशल-क्षेम पूछी। इसपर चटकलजी बिफर पड़े। कहा कि कैसे कर्मचारी आपने भेजा एसी कार तो दूर सीमा पर हमें इन्होंने पैदल ही पार करा दिया। चटकलजी  यहीं पर नहीं रुके कहा कि आप यहां पर भी आरक्षण नीति अपना रहे हैं। लुंडा जी को तो दिल में पेसमेकर लगवा रहे हैं और हमारी दिल की धड़कन बढ़ा रहे हैं।
चटकलजी की इस नाराजगी से सरकार हरकत में आई। माफी मांगते हुए कहा दोबारा गलती नहीं होगी। एसी कार तो क्या हवाई जहाज की व्यवस्था होगी। पर बात हमारी मानें उस सूबे की राजधानी में भी कुछ लोग आपसे मिलना चाहते हैं। आप खास मेहमान हैं दर्शन करना चाहते हैं। इसलिए मोतिहारी से गोरखपुर पास होते हुए आपकों पटना से दिल्ली लिवां रहे हैं। चटकलजी को दया आई,गुस्सा थूका कहा मंजूर है। विमान भेजा गया चटकलजी पटना के रास्ते दिल्ली आए।
उनके दिल्ली आते ही समस्या यह उठी कि किस आशियाने में उन्हें ठहराया जाए।इसका फैसला करने के लिए उन्हें आशियाना आवंटन विभाग भेजा गया। वहां पर चटकलजी और गड्डी जी की शख्सियत देखते हुए तिहाड़ का आशियान माकूल समझा गया। वहां उन्हें कोई परेशानी न हो इसके लिए कम से कम 12 दिनों तक उनके साथ रहने के लिए बांदी दे दिए गए। चटकलजी को तिहाड़ अच्छा लगा पर वहां पर भी उन्होंने एक फरमाइश कर दी। कहा मुझे इनसानों के चिथड़े करने का शौक है। उस बारे में क्या व्यवस्था है। सरकार ने तुंरत कहा आप निरीह इनसानों के चिथड़े करते थे जो यहां तो संभव नहीं लेकिन आप मुर्गों और बकरों के चिथड़े कर सकते हैं। इससे दो फायदे होंगे। एक तो आपकी शौक पूरी हो जाएगी। दूसरी इससे आपका बिरयानी तैयार करने के लिए सामान मिल जाएगा। रही बात मुर्गें और इनसानों के लिए हमारे लिए दोनों निरीह हैं।  आप उन्हें शौक के लिए चिथड़ों में बदलते हैं और हम राजनीति के लिए।
लेकिन सरकार का यह फरमान कुछ बांदियों को रास नहीं आया। आखिर उनकी अंतरआत्मा ने आवाज लगाया। उन्होंने तुरंत कहा चटकलजी इससे आपका हाजमा बिगड़ सकता है। इसलिए आपको योग करना चाहिए। चटकलजी ने कहा भला मैं काफिरों की हरकत क्यों करूं। लेकिन बंदियों के समझाने पर वह मान गए। तब से कर्मचारी उन्हें खड़ासन, लेटासन, बर्फनिद्रासन करा रहे हैं। उम्मीद है कि 12 दिनों में वह सेहतमंद होकर दूसरे आशियाने जाएंगे।
वहीं सरकारो में भी बेहतर मेहमाननवाजी करने का कॉम्पटीशन है। यही वजह से है कि उल्टा प्रदेश की सरकार चटकलजी और गड्डीजी को तिहाड़ में रहने के खिलाफ है। उसने वादा किया है कि जब वह दिल्ली में सरकार बनाएगी तब वह लुटियन जोन में चटकलजी के लिए एक बड़ा सा बंग्ला एलॉट कराएगी।

रविवार, 12 मई 2013

मेरी प्यारी माँ

जन जन करे नमन हे जननी जन्मदात्री मां,
पर मुझ अभागे को उसका भी अधिकार नहीं,
भावयुक्त हृदय में प्रेमयुक्त उद्गारों के लाखों शब्द भरे,
पर उनको सुनने के लिए मेरी प्यारी माँ नहीं,
धुप में कुम्हलाये चेहरे को पोंछने के लिए शीतल अंचल नहीं,
कहते है माँ नाराज नहीं होती, पर तुम क्यों नाराज हुई ,
लाख मिन्नतो के बाद भी तुमने आवाज नहीं दी,
फिर भी आस है मुझे जहाँ कही होगी मेरी प्यारी माँ ,
हृदय में मुझे बसाई होगी,
मेरे हर जख्म पर जज्बाती होती होगी
पहुँच से दूर फिर भी सलामती की  दुआ करती होगी माँ,
हाँ माँ, मै जनता हूँ तेरी मज़बूरी
मुझे शिकायत तुजसे नहीं ,
पर दिल में दबी है चाहत काश तू साथ होती,
मुझे भी अंचल के छाव में संजोती माँ,
पर तू परदेसी ठहरी, आना तेरा मुमकिन नहीं,
पर सपनो की दुनिया में ही सही एक बार नयन पलकों पर झुलाती माँ .
मातृत्व के उस कोमल एहसास को जगृत करती माँ

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...