सोमवार, 24 मई 2021

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार 

कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाखों मौतों से इनकार  नहीं किया जा सकता। सरकारी दावों के विपरीत श्मशानों में अनगिनतत चिताओं  की धधकती आग और कब्रिस्तानों में दिन-रात खोदी जा रही कब्रें स्थिति की भयावहता को बेपर्दा करती है लेकिन जिस तरह से गंगा नदी और खासतौर पर प्रयागराज में गंगा नदी के किनारे शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग  गरीबी के तड़के के साथ की जा रही है वह सांस्कृतिक व्यभिचार से अधिक कुछ नहीं। 

मैं स्वयं  जीवन के 35 बसंतों में 25 बसंतों को गंगा-यमुना के दोआब में रहते हुए गुजरते देखा  है और यहां की माटी- संस्कृति से पूर्ण तो नहीं लेकिन काफी हद तक परिचित हूं। यह सवाल जायज हो सकते हैं कि हजारों मौतों को सरकार क्यों छिपा रही लेकिन उनके दफनाने पर सवाल और गरीबी का हवाला, केवल अज्ञानता या प्रोपगेंडा ही हो सकता है बल्कि यह भी ‘सांस्कृतिक ब्राह्मणवाद’ का प्रयाय है जिसमें एक ही परंपरा, मान्यता एवं विश्वास को श्रेष्ठ मानकर बाकी को हीन दृष्टि से देखा जाता है। 

प्रयागराज  की बात करें तो यहां कई जातियों में परंपरा रही है कि शवों को केवल पांच जगह पर उसकी संतान द्वारा दाग कर दफना दिया जाता है और यह कर्म अगर गंगा के किनारे हो तो सर्वोत्तम माना जाता है। निश्चित तौर पर इस परंपरा की पृष्ठभूमि को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं लेकिन उन जातियों की यह परिपाटी रही हैं। ऐसे में उनकी इस परंपरा को गरीबी से जोड़ हिकारत से देखना  उनकी संस्कृति से व्यभिचार नहीं है तो क्या है। 

प्रयागराज के फाफामऊ पुल के पास और श्रृंगश्वेर धाम पर गंगा के  किनारे शवों को दफनाने की परंपरा रही है और ये शव फतेहपुर, कौशांबी, प्रतापगढ और जौनपुर तक लाए जाते रहे हैं और करीब एक साल तक या जबतक गंगा उसे सपाट नहीं कर दे कब्रों पर चादर, फूल आदि चढ़ाने की परंपरा रही है।  ठीक वैसे ही जैसे काशी में प्राण त्यागने देश भर से लाेगे आते हैं और बिहार तक शवों को मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए लाए जाते रहे हैं। इऐ कथित आधुनिक सोच वाला धड़ा एक पुरापंथी  विचार वाला कर सकता है लेकिन क्या जो इनका अनुपालन करते हैं उन्हें अपनी सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने का हक नहीं है? 

आज मीडिया की रिपोर्टिंग की वजह से इस परंपरा का निर्वहन करने वाली जाति भयभीत है, उसे रोज मीडिया की रिपोटिंग में जलील किया जा रहा है कि उसने गंगा को प्रदूषित करने का अपराध किया, अपने परिजनों को सम्मानजनक विदाई नहीं दी आदि-आदि। 

मीडिया के बंधुओं से सवाल है कि क्या सम्मान व्यक्त करने का तरीका निरपेक्ष हो सकता है?  संस्कृति के साथ संदर्भ बदल जाते हैं पूरे देश का बाल बंगाल में जनांग के बाल हो जाते हैं, ऐसे में एकरूप वाली परिभाषा नहीं परोसें। निश्चित रूप से गंगा में शवों को प्रवाहित करने की घटनाओं में देश की सरकारों, प्रशासन की नाकामी का पोस्टमार्टम किया , आपकी रिर्पोटिंग ने प्रशासन के आंखों में शर्म का पानी भी लाने का काम किया लेकिन कृपया कर उन लोगों के परंपराओं का भी ख्याल रखें। 

अंत में रिपोर्टरों के ब्रह्म ज्ञान का वाकया सुनाता हूं कि कैसे वे तथ्यों से सनसनी पैदा करते हैं, कुछ साल पहले बीएचयू में महिलाओं को लेकर आंदोलन चला और कुछ मीडिया के साथियों ने लिखा बीचयू में लड़कियों को छेड़ने के लिए बकायदा एक शब्द है ‘लंकेटिंग’ हम तो स्तब्ध रह गए कि आखिर दो साल हम तो वहां भुइंया ही रहे, इसका मतलब तो आजतक हम हॉस्टल से लंका जाने को ही समझ रहे थे। 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

 भोजपुरी महज गुड्डु रंगीला नहीं है जनाब ....


बाजारवाद की वजह से घर-घर पहुंची भोजपुरी या बिहार में बोले जाने वाली अन्य भाषाओं की जो छवि आपने बनाई होगी वह ऐसा ही है जैसा बिहार की 1990 के दशक के कथित जंगल राज के बाद बनी, जो दो हजार के इतिहास का एक छटांक बराबर भी नहीं है। निश्चित रूप से भोजपुरी भाषा की यह छवि बनाने में हमारी भूमिका भी रही है।

वास्तव में भोजपुरी लोकगीत विशाल सागर है और जो आप कथित फूहड़ गीत को सुनते हैं वह एक अशं मात्र है जो लोक समाज में ‘डोमकच’ के नाम से जाना जाता है। यह विवाह में गई जाने वाली ‘गारी’ (गाली)होती है।
लड़के क शादी के दौरान पुरुषों के बारात में जाने के बाद अकेले रह गई महिलाओं के रात भर जगने एवं घर की रक्षा करने के साथ बिना किसी सामाजिक आडंबर, लोकलाज के पूर्ण रूप से मुक्त होकर स्वयं को प्रकट (यौन आकांक्षा सहित) करने मात्र का एक माध्यम था जो बंद दरवाजे में आंगन में ‘‘ डोमकच’’ के नाम से गाया जाात रहा है और इसे ही गैर भोजपुरी भाषी लोगों द्वारा भोजपुरी का प्रयाय मान लिया गया है जो वास्तविकता नहीं है।
भोजपुरी वास्तव में प्रगतिशील भाषा रही है जिस समय पश्मित्तोर भारत में भी बेमेल शादी शवाब पर था तब इसी भाषा ने ‘‘ बेटीबेचवा’ गीत के माध्यम से उस बेटी की भावनाओं को मंच दिया जोअपने से कहीं अधिक उम्र के पुरुष से विवाह करने की व्यथा को लोकलाज से दबाए रहती है, संभवत: इसी कुंठा को जब महिलाएं पुरुषवादी समाज से मुक्त होती है तो घर के आंगन में ‘डोमकच’ में व्यक्त करती थीं।
यह गीत के साथ नाटक होता है जिसमें बच्चे के जन्म से लेकर, पुलिस दरोगा, चोर, हाकिम, नौकर सभी बनने का स्वांग रचा जाता है।
भोजपुरी ‘डोमकच’ से कहीं अधिक है, यह काशी की रीति को आगे बढ़ाती है, मौत को भी नायिका बना ‘निर्गुण’ में व्यक्त करती है। यह वह भाषा है जो रोजगार के लिए मीलों दूर गए परिवार के सदस्य के अलग होने की व्यथा को ‘ बिरहा’ से व्यक्त करती है।
इस भाषा में गायन की विधा है जिसमें श्रृंगार, लास्य एवं तांडव की विधा तक व्यक्त करती है। यह भाषा रही जिसमें महिला की व्यवस्था को पुरुष द्वारा व्यक्त करने की मनाही नहीं रही न ही महिला को पुरुष के भाव को व्यक्त करने की।
वहीं, अंग्रेजी में बात-बात पर ‘फक्क यू’ को शालिनता मानने वाले ‘गाली’ की विधा को हिकारत से देखते हैं जबकि पूरे हिन्दुस्तान में यह आम परंपरा है कि शादी के दौरान स्वागत के रश्म में गाली दी जाती है, यह रिश्तों के जुड़ने एवं संबंधों की मधुरता का प्रतीक मात्र है। इसपर तर्क वितर्क हो सकता है लेकिन यह वैसा ही जब दोस्ती प्रगाढ़ होती है तो औपचारिकता की सीमा नहीं होती वैसे ही जब दो परिवार जुड़ते हैं तो गारी बस अंगीकार करने एवं प्रेम प्रकट करने का महज एक आदिम परंपरा हैं
भाेजुपरी, गुड्डु रंगीला, पवन सिंह, से आगे है, महेंद्र मिशिर द्वारा 100 साल पहले लिखे श्रृंगार गीतों की आज भी कोई सानी नहीं है‘ उदाहरण के लिए ‘अंगुरी में कटले बिया नगिनिया हे नंनदी’ पूर्विया गीत को उच्च मानक प्रदान करता है।
बिंधेश्वरी देवी के गीतों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है जिन्होंने अपने जीवनकाल में 10 हजार से अधिक गीतों को आवाज दी। भरत शर्मा के निर्गुण सहज रूप से आपके हृदय में मृत्यु वैराग्य उत्पन्न कर देते हैं।
शारदा सिन्हा की आवाज में भक्ति के छठ गीत तो दिल्ली से डेनवेयर हो या एडीलेड से अमेरिका जगह छह महापर्व पर जरूर सुनई देते हैं।
जब हम भोजपुरी गीतों की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि उपशास्त्रीय ठुमरी-कजरी की जननी भी यही भाषा हैं।
अत: अगली बार गुड्डु रंगीला या पवन सिंह के कथित गानों को सुन कर भोजपुरी की छवि बनाने से पहले भिखारी ठाकुर, बिंदेश्वरी देवी शारदा सिन्हा, भरत शर्मा, मदन राय को जरूर सुने।
अंत में एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि बाजार में छवि बनाने एवं बिगाड़ने का खेल अपने हित साधने के लिए होता है लेकिन वास्तुनिष्ठ वह होता है जो सपूर्णता में चीजों को देखता है। जिस तरह ‘चोली के पीछे’ हिंदी गानों का प्रयाय नहीं हो सकती, ‘सैटरडे नाइट वेन फी फाइट’ अंग्रेजी गीतों का प्रतिनिधित्व नहीं की सकती, उसी प्रकार चंद फूहड़ गीत तो एक वर्ग की यौन उत्कंठाओं को तृत्प करने के लिए बनाए जाते हैं वे पूरे एक भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती।

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...