पश्चिम एशिया में जो हालात हैं। उससे साफ है कि गाजा में जारी संघर्ष हो या फिर सीरिया, इराक और लीबिया में कत्लेआम का दौर इसके पीछे असली वजह मध्ययुगीन सोच है, जिसमें तलवार के बल पर जमीं और जोरु पर कब्जे की चाहत होती है। भले ही अरब जगत इस फसाद के लिए इजरायली आक्रमण और अमेरिकी साजिश को जिम्मेदार ठहराएं, लेकिन उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि धर्म के नाम पर इसको खाद वे ही दे रहे हैं।
पश्चिम एशिया ऐसा क्षेत्र हैं जहां सत्ता के शीर्ष पर सह अस्तित्व के सिद्धांत को खारिज किया गया है। चाहे सऊदी अरब में शियाओं और गैर मुस्लिमों का सवाल हो या फिर ईरान में सुन्नियों के साथ दोयम दर्जे का नागरिक व्यवहार। अरब जगत गाजा को लेकर जितना एक दिख रहा है क्या उसे अन्य धर्मों के मानने वालों पर होने वाली हिंसा के खिलाफ उतना मुखर नहीं होना चाहिए। गत दो सालों में मिस्र के कॉप्टिक ईसाईयों और इराक में सीरियन ईसाईयों के साथ जो हुआ क्या इसका विरोध मुखर तरीके से नहीं किया जाना चाहिए था।
इसकी बड़ी वजह है कि पश्चिम एशिया में भारत , यूरोप और अमेरिका जैसे देशों की तर्ज पर सह अस्तित्व के सिद्धांत को शायद कभी नहीं स्वीकार किया गया। अमेरिका पर पश्चिमी एशिया सहित अन्य देशों में इस्लामी कट्टरपंथियों को बढ़ावा देने का आरोप लगता है। लेकिन क्या इस सच से मुंह मोड़ा जा सकता है कि यूरोप और पश्चिमी देशों में लोकतंत्र है और मुस्लिम सहित सभी धर्मों के लोग मोटे तौर पर अपने धर्म का अनुपालन करते हैं। अमेरिका की मस्जिदों में भी उसी शान से अजान के लिए मीनारे खड़ी की जाती हैं, जैसा कि अरब जगत में। लेकिन यह स्वतंत्रता सऊदी अरब जैसे देशों में नदारद है।
आतंकवाद का मजहब नहीं होता, इसे धर्म से जोड़ना समझदारी नहीं , लेकिन क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में इस्लाम के नाम पर फसाद फैलाए गए। इसे प्रोपेगेंडा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया में अन्य धर्मो के अपमान होने पर भी विरोध प्रदर्शन होते हैं, हिंसा भी होती है। लेकिन वर्ष 2011 में ‘इनोसेंश ऑफ मुस्लिम’ फिल्म को लेकर जिस प्रकार से हिंसक प्रदर्शन हुए और सैकड़ों की मौत हुई वह मध्ययुगीन मानसिकता और असहिष्णुता का प्रतीक नहीं है तो क्या है? इसका अभिप्राय कतई नहीं है कि ऐसे बेहूदेपन का समर्थन किया जाए, लेकिन क्या इसके जवाब में दी गई प्रतिक्रिया उससे ज्यादा अमानवीय और वहशीपना लिए हुए नहीं थी?
इस बात से कोई इनकार नहीं कि धर्म में समय के साथ कुछ रूढ़िया भी आती हैं जिन्हें निरंतर दूर करने की कोशिश की जाती रहनी चाहिए। इसका विरोध भी होगा लेकिन पश्चिम एशिया में इन कोशिशों को संगीनों के सहारे उन्हें दबाने की आतुरता अधिक दिखाई देती है। हिंदू धर्म में भी जब बहुविवाह और सती प्रथा पर रोक लगाई गई, तो कट्टरपंथियों ने खूब हो हल्ला मचाया। ईसाई धर्म में भी डायन कहकर महिलाओं को बर्बर तरीके से जलाने की घटनाएं इतिहास में दफन है। लेकिन इन धर्मों ने इसमें सुधार करने की पहल की। लाख ना नुकुर करने के बाद आखिरकार कैथोलिक चर्च ने माना कि उसके गिरिजाघरों में बच्चों के यौन शोषण हुए हैं। पश्चिम में भी श्वेत गौरवर्ण के गुरुर में थे, लेकिन अब उनकी वह पैठ नहीं रही जो 19वीं शताब्दी में थी। भारत के हिंदू समाज में भी जातियों के जकड़न में पूरा समाज कैद था, लेकिन उससे मुक्त होने की कोशिश हो रही है।
इसी तरह का प्रयास पश्चिम एशिया में करना होगा और वह भी सत्ता के शीर्ष स्तर पर। आखिर कब तक अरब जगत इस्लाम के तैमूर संस्करण को ढोता रहेगा। जहां तलवार के बल पर धर्म प्रचार की आतुरता दिखती है। संस्कृति की परिभाषा को लेकर संदर्भ अलग-अलग हो सकते हैं। पश्चिम के खुलेपन को इस्लामी जगत नहीं अपना सकता है और अपनाना भी नहीं चाहिए। लेकिन क्या जिस धर्म में लड़की की इजाजत के बिना शादी की मनाही है वहां जबरन शादियों या पैसे देकर शादियों पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। इस्लामी जगत में अपराधियों को दी जाने वाली सजा और मानवीय नहीं बनाई जा सकती है। निश्चित तौर पर इस मामले में ईरान की प्रशंसा करनी चाहिए कि उसने कुछ हद तक इस ओर पहल की है और यहां पर महिलाओं की स्थिति सऊदी अरब की महिलाओं जैसी नहीं है। मध्यकाल में युद्ध होते थे और उस समय जीत की वस्तु के रूप में महिलाओं को देखा जाता था। इसलिए पर्दे से लेकर पुरुष साथी के साथ ही घर से बाहर जाने की बंदिश थी। क्या इन देशों में अब बदले हालात में महिलाओं के लिए उसी तरह की बंदिश की जरूरत है क्या इसपर चर्चा नहीं होनी चाहिए?
आखिर वक्त के साथ जब हम तलवार की जगह मिसाइल को अपना सकते हैं, हवाई जहाज से उड़ सकते हैं, तो फिर इन कट्टर सोच के पैमानों में सुधारों की कोशिश क्यों नहीं?
पश्चिम एशिया ऐसा क्षेत्र हैं जहां सत्ता के शीर्ष पर सह अस्तित्व के सिद्धांत को खारिज किया गया है। चाहे सऊदी अरब में शियाओं और गैर मुस्लिमों का सवाल हो या फिर ईरान में सुन्नियों के साथ दोयम दर्जे का नागरिक व्यवहार। अरब जगत गाजा को लेकर जितना एक दिख रहा है क्या उसे अन्य धर्मों के मानने वालों पर होने वाली हिंसा के खिलाफ उतना मुखर नहीं होना चाहिए। गत दो सालों में मिस्र के कॉप्टिक ईसाईयों और इराक में सीरियन ईसाईयों के साथ जो हुआ क्या इसका विरोध मुखर तरीके से नहीं किया जाना चाहिए था।
इसकी बड़ी वजह है कि पश्चिम एशिया में भारत , यूरोप और अमेरिका जैसे देशों की तर्ज पर सह अस्तित्व के सिद्धांत को शायद कभी नहीं स्वीकार किया गया। अमेरिका पर पश्चिमी एशिया सहित अन्य देशों में इस्लामी कट्टरपंथियों को बढ़ावा देने का आरोप लगता है। लेकिन क्या इस सच से मुंह मोड़ा जा सकता है कि यूरोप और पश्चिमी देशों में लोकतंत्र है और मुस्लिम सहित सभी धर्मों के लोग मोटे तौर पर अपने धर्म का अनुपालन करते हैं। अमेरिका की मस्जिदों में भी उसी शान से अजान के लिए मीनारे खड़ी की जाती हैं, जैसा कि अरब जगत में। लेकिन यह स्वतंत्रता सऊदी अरब जैसे देशों में नदारद है।
आतंकवाद का मजहब नहीं होता, इसे धर्म से जोड़ना समझदारी नहीं , लेकिन क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में इस्लाम के नाम पर फसाद फैलाए गए। इसे प्रोपेगेंडा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया में अन्य धर्मो के अपमान होने पर भी विरोध प्रदर्शन होते हैं, हिंसा भी होती है। लेकिन वर्ष 2011 में ‘इनोसेंश ऑफ मुस्लिम’ फिल्म को लेकर जिस प्रकार से हिंसक प्रदर्शन हुए और सैकड़ों की मौत हुई वह मध्ययुगीन मानसिकता और असहिष्णुता का प्रतीक नहीं है तो क्या है? इसका अभिप्राय कतई नहीं है कि ऐसे बेहूदेपन का समर्थन किया जाए, लेकिन क्या इसके जवाब में दी गई प्रतिक्रिया उससे ज्यादा अमानवीय और वहशीपना लिए हुए नहीं थी?
इस बात से कोई इनकार नहीं कि धर्म में समय के साथ कुछ रूढ़िया भी आती हैं जिन्हें निरंतर दूर करने की कोशिश की जाती रहनी चाहिए। इसका विरोध भी होगा लेकिन पश्चिम एशिया में इन कोशिशों को संगीनों के सहारे उन्हें दबाने की आतुरता अधिक दिखाई देती है। हिंदू धर्म में भी जब बहुविवाह और सती प्रथा पर रोक लगाई गई, तो कट्टरपंथियों ने खूब हो हल्ला मचाया। ईसाई धर्म में भी डायन कहकर महिलाओं को बर्बर तरीके से जलाने की घटनाएं इतिहास में दफन है। लेकिन इन धर्मों ने इसमें सुधार करने की पहल की। लाख ना नुकुर करने के बाद आखिरकार कैथोलिक चर्च ने माना कि उसके गिरिजाघरों में बच्चों के यौन शोषण हुए हैं। पश्चिम में भी श्वेत गौरवर्ण के गुरुर में थे, लेकिन अब उनकी वह पैठ नहीं रही जो 19वीं शताब्दी में थी। भारत के हिंदू समाज में भी जातियों के जकड़न में पूरा समाज कैद था, लेकिन उससे मुक्त होने की कोशिश हो रही है।
इसी तरह का प्रयास पश्चिम एशिया में करना होगा और वह भी सत्ता के शीर्ष स्तर पर। आखिर कब तक अरब जगत इस्लाम के तैमूर संस्करण को ढोता रहेगा। जहां तलवार के बल पर धर्म प्रचार की आतुरता दिखती है। संस्कृति की परिभाषा को लेकर संदर्भ अलग-अलग हो सकते हैं। पश्चिम के खुलेपन को इस्लामी जगत नहीं अपना सकता है और अपनाना भी नहीं चाहिए। लेकिन क्या जिस धर्म में लड़की की इजाजत के बिना शादी की मनाही है वहां जबरन शादियों या पैसे देकर शादियों पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। इस्लामी जगत में अपराधियों को दी जाने वाली सजा और मानवीय नहीं बनाई जा सकती है। निश्चित तौर पर इस मामले में ईरान की प्रशंसा करनी चाहिए कि उसने कुछ हद तक इस ओर पहल की है और यहां पर महिलाओं की स्थिति सऊदी अरब की महिलाओं जैसी नहीं है। मध्यकाल में युद्ध होते थे और उस समय जीत की वस्तु के रूप में महिलाओं को देखा जाता था। इसलिए पर्दे से लेकर पुरुष साथी के साथ ही घर से बाहर जाने की बंदिश थी। क्या इन देशों में अब बदले हालात में महिलाओं के लिए उसी तरह की बंदिश की जरूरत है क्या इसपर चर्चा नहीं होनी चाहिए?
आखिर वक्त के साथ जब हम तलवार की जगह मिसाइल को अपना सकते हैं, हवाई जहाज से उड़ सकते हैं, तो फिर इन कट्टर सोच के पैमानों में सुधारों की कोशिश क्यों नहीं?
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