गुरुवार, 23 जून 2011

राह में कोई मिला

राह में कोई मिला
यू ही अकेला
मै ने पूछा
क्या नाम है भाई
उसने हँसते हुए बोला
गम और खुशी का मेल हूँ मेरे भाई
मै कुछ सक्पक्या
थोडा अपने दिल को समझाया
फिर समेट कर आत्म बल
पूछा कहां से आ रहे हो मेरे भाई
उसने तुनक कर कहा मै तो सदा से यही था
मैंने पूछा तुम इतने दिनों तक क्यों नहीं दिए थे दिखाई
वह मुस्कुराया फिर शर्मया,
फिर बोला मेरे बेवकूफ हमसफ़र
मै तो जीवन का सच हूँ
फिर कैसे रहे तुम अब तक अनजान
खेर तुम्हारी नहीं है गलती
यह तो आदमजात की है औकात
जीवन की खुशियों को रो कर करता है स्वीकार
तुम लगते हो भले मानुष
इसलिए जीवन का सच बताता हूँ
खुशी और गम तो दिल में रहता है
फिर भी उसे इन्सान ढूद्ता है
सोने में खोजता चाँदी में खोजता
और खोजता है संतान में
पर बेवकूफ नहीं जनता
यह में नहीं झांकता
असली खुशी तो भीतर है
क्यों नहीं मान पाता
अगर वह समझ जाता तो अल्लाह के नाम पर जिहाद क्यों चलाता
राम के नाम पर अयोध्या में फसाद क्यों कराता
पर मेरे समझाने से तू भी नहीं समझेगा चल हट राह दे मुझे
मै मस्त होकर किसी और को समझाने जाता हूँ
आशा की अलख फिर जे जगाने जाता हूँ

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