गुरुवार, 6 सितंबर 2012

जिस्म नहीं इश्क की मंजिल

जिस इश्क की मंजिल जिस्म हो ,
 खुदा करे वह इश्क मुझे कभी न हो
जहाँ जुबान से जज्बात बनते हो,
अल्लाह करे उस इश्क की फरियाद मैं कभी न करू
क्योंकि,
सच्चे इश्क में  जिस्म से ज्यादा रूह करती है काम
अगर यह सच न होता, तो बादशाह अनारकली की जिस्म को चांदी से तौल देता
मंजनू एक अदद जिस्म के लिए यूं दुनिया वालो दुश्मनी न मोल लेता ,
ज़माने में और भी फ़साने हैं , जहाँ जिस्म से ज्यादा जज्बातों के परवाने हैं ,
अगर जिस्म इश्क का मकसद होता,
तो कृष्ण को इसकी क्या कमी थी,
रुकमनी से लेकर सोलह हज़ार रानी सामने खड़ी थी,
पर कृष्ण को राधा भाई, रयान की पत्नी होते हुए भी कान्हा की कहलाई,
वजह थी साफ़, दोनों की रूह थी आत्मसात,
पर नए ज़माने के इश्क्बाजों  को कौन समझाए,
जो जिस्म को इश्क की इबादत मानते है,
न मिले जिस्म तो मेट्रो से कूद जाते हैं,
इश्क के नाम पर अपनों के भी खून करने में एक पल न गवाते हैं,
हाँ, कुछ लोग मेरे जज्बात को जाहिल कहने के लिए खड़े हैं,
कुछ मुझे सनकी साबित करने पर तुले हैं,
एक महाशाए तो इससे भी आगे बढे हैं. इश्क को पुरुष तंतु से जोड़ गए हैं,
यदा- कदा तीखी टिपण्णी करते है
पर मुझे इससे क्या, सच्चाई तो कहना ही था, कृष्ण को  नीतिवान होकर भी मरना ही था,
सो मैं भी तयार हूँ, तर्कों के काँटों पर सवार हूँ. आओ  करो हमले, हम जवाब देंगे,
फिर भी इश्क को जिस्म की मंजिल कभी नहीं कहेंगे
हम इश्क को मानते पाक. जिसमे जिस्म की नहीं होती है सौगात.
(नोट : यह उन लोगो के लिए समर्पित है जो इश्क को सिर्फ शारीरिक मिलन का पर्याय मानते है. और जब मिलन संभव न हो तो इश्क की नाकामी मान जिंदगी से हार बैठते है. पर असल प्यार तो रूह से होती है जो सरीर के चिता में जल जाने के बाद भी कायम रहती है.)

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