मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

भीड़ में तनहा अकेला

भीड़ में तनहाई में मै अकेला ,जज्बातों के पहरे में मै अकेला ,

साँझ की बेला में मै अकेला , रात के सपनो में मै अकेला ,

जिंदगी की हर मोड़ पर मै अकेला , इस अकेले राह पर मै ये सोचता हूँ ,

पथिक कोई साथ होता, स्वप्न डगर में उसका का हाथ होता ,

पर क्या यह है मुमकिन? विधाता इतना है सनदिल,

राह चलते उसने छिना , प्रियतमा का हाथ,

हाथ छुटा स्वप्न टूटा , टूट गये अरमान ,

आह निकली , आस फिसली , बह गये अश्रु धार ,

पर कोई नहीं समझा , मेरे मन के चीत्कार,

त्रेता का मै हनुमान नहीं , जो कलेजा चिर दिखाऊ,

नहीं मै राम की गम को दिल में छुपाऊ,

पर न कोई राह है, न कोई मंजिल ,

बस चलता हूँ क्योंकि चलना ही है जिन्दगी , पर गम में न संघी है , न साथी,

फिर भी भीड़ में तनहा ही चले जा रहा हूँ ।

1 टिप्पणी:

  1. dhiraj aj tumhari ye kriti par sach me ankhon me ansun aa gaye...tumhare bare me maine jo bhi galat socha uske liye maaf karna..main shayad kabhi samjh bhi na paungi ki tum pr kya kya biti aur kya kya bit rahi hai...i m so sorry agar maine tumhare sath kuch bura kiya ho to....

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