शुक्रवार, 12 मार्च 2010

महिला आरक्षण एक नई पहल

भारतीय लोकतंत्र का सबसे सुनहरा दिन ९ मार्च का था। जब भारतीय उच्च सदन राज्य सभा ने १४ साल से लंबित ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण बिल 1 विरोध के मुकाबले १८६ के समर्थन के साथ पास कर दिया, हालांकि इस बार भी कुछ पार्टियों ने खास तौर पर यादवो की तिकड़ी लालू, मुलायम, और शरद यादव ने मिल कर इसका जोरदार विरोध किया। विरोध इतना किया की संसद की मान मर्यादा को भी ताक पर रखने में परहेज नहीं किया। उनका विरोध खास तौर पर पिछड़ी महिलाओ और मुस्लिम महिलाओ को भी इसमें कोटा के मांग को लेकर था। ऊपरी तौर पर यह मांग एकदम जायज लगती है। क्योंकि पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओ खास तौर पर मुस्लिम महिलाओ के प्रतिनिधित्व के बिना देश के लोकतंत्र को सफल नहीं बनया जा सकता है। पर सिर्फ कोटा के अन्दर कोटा के मुद्दे को लेकर एक नव शुरुआत को ही रोक देना ठीक वैसे ही है जैसे गरीबी को एक साथ मिटा पाना मुस्किल हो तो उसके लिए योजना बनाना ही छोड़ देना। जहां तक यादव तिकड़ी की बात है तो मुस्लिम महिलाओ के अधिकार के लिए जो कृदन है वह कोरी राजनीति और बिल को रोकने की कोशिश के अलावा कुछ भी नहीं। अगर वास्तव में वह इन वर्गों के हितैषी थे तो इनकी पार्टी में केवल राबड़ी  देवी,दिम्पल यादव , और जय परदा के अलवा उन्होंने किसी और को क्यों मौका नहीं दिया। अगर वह असली में मुस्लिम महिलाओ के हितैषी थे तो उन्होंने शाह बनो के अधिकारों के लिए जिसे सुप्रीम क मान्यता दे चुकी थी क्यों नहीं आगे आएं।

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