होली आई , सभी के लिए रंग लाई
हाय मेरी जिन्दगी में रंग कहाँ,
रंगों को तो मै नौ साल पहले ही भूल गया था,
जब किसी के अर्थी के साथ खेली थी होली,
आंसुओ के पानी से, दुखो के भांग से मैं ने किया था चीत्कार
पर दुनिया को दिखाने के लिए हंसी का मुखौटा था साथ
पर इस होली में मुखौटे का वह सहारा भी न रहा
दिल्ली में हाइ मैं आवारा ही रहा,
दिन में तो दोस्त था साथी, पर रात आंसुओं से गुलजार था
यह भाग्य की ही है विडम्बना, रोटी के निवाले के लिए
उस दिन भी मैं रहा तन्हा,
गम की इस कहानी को किसे मैं सुनाऊ
रंगों की इस दुनिया में श्वेत-श्याम चित्र कहां दिखाऊं
हाय मेरी जिन्दगी में रंग कहाँ,
रंगों को तो मै नौ साल पहले ही भूल गया था,
जब किसी के अर्थी के साथ खेली थी होली,
आंसुओ के पानी से, दुखो के भांग से मैं ने किया था चीत्कार
पर दुनिया को दिखाने के लिए हंसी का मुखौटा था साथ
पर इस होली में मुखौटे का वह सहारा भी न रहा
दिल्ली में हाइ मैं आवारा ही रहा,
दिन में तो दोस्त था साथी, पर रात आंसुओं से गुलजार था
यह भाग्य की ही है विडम्बना, रोटी के निवाले के लिए
उस दिन भी मैं रहा तन्हा,
गम की इस कहानी को किसे मैं सुनाऊ
रंगों की इस दुनिया में श्वेत-श्याम चित्र कहां दिखाऊं
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