मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

दर्द ए बयां

अफसाने लिखने का दिल नही करता,
जज्बात ए बयां करने का दिल नहीं करता,
मै हूँ काफ़िर इसे स्वीकार करने का दिल नहीं करता,
जहाँ में आया हूँ अकेला ; यह एइत्बर करने का दिल नहीं करता,
गम ए आरजू बयां करने का दिल नहीं करता।
तन्हाई में बैठे सहर ए दिलदार दिल्ली में पर दिल लगाने का दिल नहीं करता,
शाम को जब जलता है चिराग ए जहाँ,
तब लगता है की जल रहा है ख्वाब मेरा,
इस जलते फ़साने इज रोने का दिल नहीं करता,
आंसू मै छिपता हूँ, आँखों की इस बंदगी से,
खुदा कसम सबको बताने का दिल नहीं करता।
आज मै हूँ मजबूर,
आँखों के आगे अँधेरा है खूब
आये मेरे साथी तू कहाँ गया तुझे अपनाने की हसरत से रोता है दिल, पर आंसू निकलने कअ दिल नहीं karta

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