रविवार, 20 मई 2012

आधिकारिक रूप से सठिया गई है संसद


13 मई को देश की संसद आधिकारिक रूप से सठिया गई। इस मौके पर सांसदों ने जश्न मनाया और हमें भी देश में लोकतंत्र की जड़ मजबूत हो रही है इस मुगालते के साथ उन खुशियों में शरीक होता हुआ दिखाया। पर वास्तव में संसद के साठ साल जश्न मनाने के लिए उपुक्त था? वह भी तब जब लोकतंत्र की दुहाई देने वाले सांसदों को आज से साठ साल पहले बनाए गई कार्टून का किताब में छापना नागवार गुजर रहा था। क्या यही लोकतंत्र की मजबूत जड़े हैं जहां अभिवयक्ति की स्वतंत्रता को खुद चुने हुए सांसद मर्दन करने के लिए उतारू हैं। कहते है लोकतंत्र में सांसद लोगों का प्रधिनित्व करता है, क्या हमारे सांसद को देख कर ऐसा कहा जा सकता है? निश्चित तौर पर नहीं।  हमारी सांसद और फ्रांस के बुर्जुआ वर्ग में कोई अंतर नहीं है। हमारे संसद में भी ठीक उसी तरह आम लोगो की रोटी को लूटने वालों पर खामोशी बरती जाती है, तो जनगारूक प्रतिनिधि का आपके हितों के लिए काम करने वाले संसद की छवि भ्रम से अधिक कुछ नहीं है।
वास्तव में यह दिन जश्न मानाने का नहीं मंथन करने का है। आखिर कैसे एक ओर गरीब जनता और  गरीब होती जा रही और सांसदों का बैंक बैलेंस बढ़ता जा रहा है? क्यों भ्रष्ट सांसदों को संसद विशेषाधिकार का कवच प्रदान करती है।  ऐसा नहीं है यह समस्या नया है। आजादी के महज दो साल के भीतर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के नाक के नीचे जीप घोटाला हो जाता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौर में यह कुप्रथा अपने चरम पर पहुंच जाती है और वह कौरव सभा की तरह भारतीयों की कमाई का द्रोपदी की तरह चीरण होने पर आंखे बंद कर देखते रह जाते हैं।
ऐसे में जनता को ठगने और कुछ मुट्ठी भर लोगों के हित साधक बन चुकी संसद की विश्वसनीयता का क्षीण होना आश्चर्यजनक नहीं है। इसलिए संसद को तय को अपने स्तर पर अग्निपरीक्षा देनी है। उसे साबित करना है कि उसके द्वारा बनाए गए कानून का पालन बाहर की जनता नहीं संसद के भीतर सांसदों को भी करना होता है और वे इसमें आदर्श हैं।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

 प्रयागराज में शवों के दफनाने की रिपोर्टिंग : सांस्कृतिक व्यभिचार  कोरोना महामारी की इस दूसरी  लहर में सरकारी हजारों और आम मनस के पटल पर लाख...