शनिवार, 23 जून 2012

छद्म सेकुलरवाद एक और बयार

मोदी को प्रधानमंत्री बनने की खबर आते ही छद्म सेकुलरवादियो को  छिंके  आने लगती है। वह  २००२ के गुजरात दंगो की दुहाई देने लगते हैं। कुछ फेसबुक के मनीषी भी उनका साथ देने लगते है और चिंघाड़ मारते जैसे देश एक पल में गृहयुद्ध में चला जाएगा। पर वो भूल जाते हैं की देश में ज्यादा दंगे तथाकथित सेकुलर हुकुमतो में ही हुआ है।  लेकिन उनपर कोई सवाल नहीं उठाता है। कम से कम इस मामले में हमारा देश तो निराला है। हम लकीर का फकीर पीटना नहीं भूलते। निश्चित तौर से किसी भी दंगे को जायज नहीं ठहराया जा सकता है फिर चाहे वो भागलपुर के दंगे हो या १९८४ के सिख दंगे या गुजरात के दंगे। पर समस्या तब आती है जब हम एक पक्ष के दुःख को अन्याय कहते हैं और दूसरे पक्ष के गम को नियति। कुछ यही मामला गुजरात में भी हुआ। इस दंगे की पृष्ठभूमि में गोधरा था। २७ फ़रवरी की घटना के बाद सोमनाथ ने इसके लिए कारसेवकों को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। लालू के निर्देश पर बनर्जी कमीशन रिपोर्ट में कहा गया डिब्बो में भीतर से लगी आग। उसे सभी ने पचा लिया जिसने विरोध किया वो सांप्रदायिक हो गया। तीस्ता को भी यह याद नहीं आता। गुजरात दंगो में मारे गए लोगो की जाँच करा खुद सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है पर उन कारसेवको का क्या जिन्हें मौत के बाद लुटेरा तक करार दिया गया। क्या उनके बच्चो को यह अधिकार नहीं है की उन्हें न्याय मिले। निश्चित रूप से गुजरात दंगे हिंदुस्तान के इतिहास का काला अध्याय है। पर इस अध्याय से पहले भी कई अध्याय लिखे गए हैं। कश्मीर से हिन्दुओ का पलायन कश्मीर का मामला मान कर नहीं छोड़ा जा सकता। इस आन्दोलन में सक्रिय रहने वाले हुर्रियत को सरकार सुरक्षा देती है। पर कश्मीरी पंडितों के मामले पर कोई सवाल नहीं क्योंकि वोट की फसल उनकी इतनी ज्यादा नहीं है इसलिए बे सहारा है। कुछ यही हाल सिखों का है। इसलिए सभी के न्याय की बात होनी चाहिए और सेकुलरवाद की जागीर किसी एक पक्ष के समर्थक को ही नहीं दी जानी चाहिए। 

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