मै उनकी यादो की छाव में जीता ,
दरिया के साहिल को दिल में सीता ,
बस आरजू है की इन यादो को समेटू,
पर कम्बखत इस ज़माने को यह भी नही मंज़ूर,
यादो की कसती के सहारे मै जिउ अपनों को भी यह नही काबुल,
सोचता हूँ आँखों के कगार को न तोडू,
ज़माने के गम को हंस के छोडू,
महफिल के रौनक में दिखा दू कि हँसता हूँ ,
अस्को पर फब्ती कसता हूँ ,
पर क्या दोहरी जज्बात ऐ इज़हार मुनासिफ होगा?
अपने अरमानो को छिपा जीना मुमकिन होगा?
कुचे ये सवाल है जिनका जवाब मुस्किल होगा,
पर राही मै ने इसे भी पार लिया है,
एक जवाब तयार किया है ,
मेरे यादो को मत छीनो ,
मेरी दुनिया में मुझे जीने दो.
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