गुरुवार, 12 नवंबर 2009

मुझे तो सबने छला ही

एक रात बैठी थी प्रीतम की याद में ,


प्रीतम आयगा स्वप्न महल सजएगा,


हूँगी मैं प्रफुलित प्रीतम के बांहों में,


मैं भी प्रीतम को कजरे की डोर से बंधने की आस में,


सारी रात जगती रही ,खुले आँखों से पलकों के पंख को झलती रही,


है तभी तूफ़ान आया , प्रीतम को मन न भाया ,


वोह कही दूर चला , स्वप्न महल भूल चला,


नही सुनी प्रियतमा की भी पुकार ,प्रीतम की याद में वोह करती रही चीत्कार

आँखों का नींद टूटा, अरमानो का घर लूटा ,

सुबह की किरण फूटी, दिल की आह छुटी ,

आँखों के कगार टूटे , तब मैंने यही सोचा ,

पहली बार तो हुआ नही , सावन ऐसे ही छुआ नही,

प्रियतमा की तो पुराणी कहानी , बिरह में जलना है रवानी,

दुष्यंत भी तो प्रियतमा को छोड़ चला था, अपनी आंखे मोड़ चला था,

शकुन्तला रोअती रही रात रात भर , प्रीतम की आस में ,

प्रीतम ठहरा कठोर शिला , कहा पिघलने वाला था ,

सकुन्तला को दर्द अकेले सहे जाना था , अंत में प्रियतमा के अश्रु से बात निकली ,

कुंठित मन से दुःख संगीत की तान निकली, भराई अश्रु से बस दो शब्द निकले ,

प्रियतमा की तो यही कहानी, सब्से छले जाने पर भी आस न छोडो ,

नित यही आस से जियो छलिया प्रीतम आयेगा , बाहों का हार पहनायेगा ,

तब मैं आस पुराऊंगी , फिर से एक बार सधवा कह्लावूंगी ,

नित यही आस है जो नही होती पुराणी , प्रीतम की याद मई यू ही सजाती हूँ ,

छलिया को छलने पर भी खुशी धून हूँ गाती .

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