गुरुवार, 12 नवंबर 2009

एक रात

एक रात सोया था , सपनो में खोया था,
तभी एक आवाज़ आई , आवाज़ थी पहचानी ,
हिरदय से जानी, भला इसे कोई भूलता है ,
माँ से कोई भिनता है ,
पर विधाता को भी कुछ भाता है ,
झट से नींद छुटी , सपने की भी डोर टूटी ,
आँखों को मलता हूँ , आस पास झोलता हूँ ,
पर सब अँधेरा है , सवपन महल अकेला है ,
उठ कर झटकता हूँ ,आंखे मल ढूढता हूँ ,
सुबह की लालिमा छाई , जग में है खुसिया आई,
पर मेरे मन में अँधेरा ने दे दी थी दस्तक ,
आख़िर माँ हो गयी थी रुखसत ,
अपने पर हँसता , अपने पर रोता हूँ ,
बिधाता को कई - कई बार कोसता हूँ ,
मैं ही था निरीह प्राणी जो तुने छिना रानी,
बीत गए साल साल पर दर्द है अज ,
फिर मैं सोचता हूँ , दिन को कोसता हूँ ,
खुस मैं होता हूँ रात जब आती है सपनो में ही सही लोरी तो सुनती है ,
चरणों का अब सुख नही , अंचलो की छाओ नही ,
अभागे जीवन में माँ का लगाओ नही ,
दर्द की दोपहरी अकेले सहा जाता हूँ , सपनो की आस में रात में जिए जाता हूँ ।

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